रानी पद्मावती के बहाने किस पर प्रहार?

By Jagatvisio :18-11-2017 08:35


कठपुतली के इस खेल में जो लोग डोर हाथ में लिए पर्दे के पीछे खड़े हैं, वे लोग अपनी राजनीति साधने के लिए देश के सामाजिक ढांचे को चरमरा देना चाहते हैं। आग तो राजस्थान के बाहर उन जगहों पर फैल चुकी है, जो राजपूत बहुल इलाके हैं। जाति, संप्रदाय की जब बात होती है, दिमाग सुन्न हो जाता है। यही तो वो लोग चाह रहे हैं, जिन्हें येन-केन-प्रकारेण गुजरात, और 2019 जीतना है!

संविधान के अनुच्छेदों और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के बिना पर सुना कि भारत में रहने वाले सभी नागरिकों को समान अधिकार दिये गये हैं। तीन उदाहरण देता हूं। 15 मई 2014 को अमरेश मिश्रा नामक व्यक्ति ने ट्वीट कर मोदी जी को जान से मारने की धमकी दी थी। लखनऊ पुलिस ने उसे फौरन गुड़गांव में गिरफ्तार किया था। मोदी जी तब तक प्रधानमंत्री नहीं बने थे। 9 जून 2015 को मुंबई पुलिस ने सत्यप्रकाश कलवाणी नामक व्यक्ति को प्रधानमंत्री मोदी को धमकी वाले एमएमएस भेजने के मामले में तत्काल पकड़ा था। तीसरी घटना 26 फरवरी 2017 की है, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र दीपक को पुलिस ने हिरासत में लिया, जिसने मऊ में मोदी की रैली में ब्लास्ट करने की धमकी एक फोन पर दी थी।

अब दूसरी तस्वीर पिछले पन्द्रह दिनों से हम सब सड़क से सिनेमाघरों तक देख रहे हैं। फिल्मकार संजय लीला भंसाली को रोज जान से मारने की धमकी, थियेटरों में तोड़फोड़ और इसे और भयावह बनाने के वास्ते पद्मावती का किरदार निभा रही दीपिका पादुकोण की नाक काटने की धमकी। यह किसी मसालेदार फिल्म की पटकथा नहीं है। यह एक ऐसी स्क्रीन प्ले है, जिसे सत्ता चलाने वाले लोग पर्दे के पीछे से लिख रहे हैं। क्या यह अजीब नहीं कि महाराष्ट्र पुलिस ने दीपिका पादुकोण को विशेष सुरक्षा दी है, मगर जिसने कैमरे के सामने खुलेआम नाक काटने की धमकी दी है, वह छुट्टा घूम रहा है। 

गुंडा तत्व बड़े गर्व से शूर्पणखा का उदाहरण देते हैं। लेकिन ऐसा उदाहरण देते समय ये लोग भूल जाते हैं कि राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद शूर्पणखा एक औरत थी। विडंबना है कि दलित समाज के प्रतिनिधि, और आदिकवि वाल्मिकी 'रामायण' में उन शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो एक औरत के सम्मान के विरूद्ध है। उन्होंने शूर्पणखा को घोड़े जैसी मुखाकृति वाली, कर्कश आवाज, हांडी जैसा निकला हुआ पेट और ओवरसाइज स्तनों वाली नारी के रूप में उकेरा है। नाक काट लेने की घटना को सदियों से हम न्यायसंगत मानते रहे। इसलिए, क्योंकि धर्म तर्क करने की अनुमति नहीं देता। और इस समय देश में जिस तरह का माहौल है, उसमें तो और भी नहीं। 

 ऐसी क्रूरता, और विसंगति पर हम कभी विमर्श नहीं करते। भारतीय उपमहाद्वीप में औरत को अपमानित करने, उसकी नाक काटने की इस वीभत्स और विकृत प्रवृत्ति को सबसे अधिक शह, अफगानिस्तान में तालिबान शासन के समय मिला। उसे आज भी वहां का कबिलाई समाज दहशत फैलाने के वास्ते एक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करता है। अगस्त 2010 में टाइम मैगजान के कवर पर जब एक अ$फगान युवती आयशा बीबी की नाक कटी तस्वीर छपी, तो दुनिया सिहर गई थी। आयशा का कुसूर इतना था कि पति की रोज-रोज कर मार पिटाई को सह नहीं पाई थी, और उसने घर छोड़ दिया था।

 इस कवर स्टोरी के कई महीने बाद करजई सरकार नींद से जागी, और आयशा के ससुर को गिरफ्तार किया। बाहरी दुनिया के लिए करजई चाहे जैसा शासन चलाते रहे, मगर उनके दौर में भी औरतों की बड़ी दुर्दशा हुई, उनपर खूब सितम ढाये गये। इस $खबर के बाद, अफगानिस्तान में औरतों के नाक-कान काटे जाने के दर्जनों मामले नमूदार हुए। ऐसी बहशत को अफगानिस्तान की इस्लामिक कौंसिल, और शरिया अदालतें कुरान के उन 114 सूराओं में से 'सूरए निसा' के 14वें आयत के हवाले से इसे सही ठहरा रही थीं।

यूरोप, जिसे हम बहुत सभ्य समझते रहे, वहां भी मध्ययुग में ऐसी बर्बर घटनाओं को राज्य शासन ने सही ठहराया था। पांचवी-छठी सदी का 'फ्रेंकिश लॉ' बेवफाई करने वाली औरतों और छल-प्रपंच करने वाले पुरुषों के नाक-कान काट लेने, चेहरे को बिगाड़ देने को सही $कदम बताता था। 593 सदी तक जीवित रहे पूर्वी रूढ़िवादी चर्च के 'विशप ग्रेगरी ऑफ टुअर', जिन्हें संत की उपाधि दी गई, उनके समय फ्रांस में नाक-कान काटने के कई उदाहरण मिले। 'विशप ग्रेगरी ऑफ टुअर' के समय बाइबिल में एक पैरा 'बुक ऑफ इ•ाकिल चैप्टर 23 से 25Ó में मिस्र की वारांगणा ओहोलिबाह के नाक काटे जाने के संदर्भ को न्यायोचित ठहराया गया। 

छठी सदी के रोमन लेखक थे जोर्डन्स, उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'गेटिका' में लिखा कि उत्तरी अफ्रीकी देश वेंडाल के राजा हुनेरिक ने अपनी पहली पत्नी के नाक-कान काटकर उसके मैके भेज दिया था। किंग हुनेरिक को शक था कि उसके पिता को वह देने की साजिश में शामिल थी। 1453 तक रोम की सत्ता संभालने वाले बाइजेंटाइन शासकों के काल में ओल्ड टेस्टामेंट के कुछ संदर्भों के हवाले से नाक, कान काटने की घटनाएं खूब हुईं और रूढ़िवादी चर्च की सरपरस्ती मिलती गई। डेनमार्क, इंग्लैंड और नार्वे पर 1035 ईस्वी तक शासन करने वाले किंग क्नूट ने तो बाकायदा $कानून बना दिया था कि जो औरत पति के प्रति वफादार न हो, उसके नाक-कान काट दिये जायें। 11वीं सदी में इंग्लैंड के किंग एडगर ने भी इस अंधा $कानून को जारी रखा। इसलिए हम ये कहें कि धर्म की आड़ में सि$र्फ हिंदू धर्मान्धों ने औरतों के नाक-कान काटे ऐसा नहीं है। लेकिन क्या हम वापस मध्य युग की ओर लौट रहे हैं? दीपिका पादुकोण को दी गई धमकी के संदर्भ में यह सवाल तो बनता है। 

 
रानी पद्मावती विवाद में अहम अब यह विषय हो गया है कि इससे कौन-कौन से पक्ष लाभान्वित हो रहे हैं। जनवरी 2017 में जयपुर के पास जसगढ़ किले में शूटिंग के दौरान करणी सेना के लोग संजय लीला भंसाली पर हमला नहीं करते, तो न तो करणी सेना को कोई नोटिस लेता, न पद्मावती फिल्म को। फिर 6 मार्च 2017 को चितौड़गढ़ किले पर वहीं करणी सेना के कमांडो इस फिल्म क्रू पर हमला करती है, और इसके हफ्ते भर बाद तीसरा हमला 15 मार्च को कोल्हापुर में होता है। 

प्रश्न यह है कि जब संजय भंसाली एक कल्पना पर आधारित एक ऐतिहासिक फिल्म बना रहे हैं, जिसमें डांस, ड्रामा, खून-खच्चर सब कुछ उन्हें डालना आवश्यक लगता है, तो उसे उसके रीयल लोकशन पर शूट करने की आवश्यकता क्यों पड़ गई? हम क्यों इस पहलू पर नहीं सोचें कि संजय लीला भंसाली एक ऐसी रणनीति बना चुके थे, जिसमें उनके द्वारा निर्माणरत 'पद्मावती' निरंतर चर्चा में रहे? इस फिल्म की एडिटिंग से लेकर उसके प्रोमो के कुछ अंश तैयार करने तक लगातार धमकी। और फिल्म के प्रोमो प्रदर्शित एकाध थियेटर में हुए, तो तोड़फोड़। गुरुवार तक का क्लाइमेक्स यह रहा कि हीरोइन की नाक काट लेने की धमकी दे डाली गई। ये हो क्या रहा है? 

पद्मावती पर पहली मूक फिल्म 'कामोनर अगुन' 1930 में बनी थी, जिसमें देवकी बोस ने काम किया था। 1963 में तमिल में चित्तौड़ 'रानी पद्मावती चित्रापु' नारायणा राव ने बनाई थी। उसमें शिवाजी गणेशन और वैजयंतीमाला लीड रोल में थे। क्या करणी सेना को मालूम है पद्मावती का रोल निभा रही वैजयंतीमाला ने उसमें डांस किया या नहीं था? वैजयंतीमाला जीवित हैं, और उनकी नाक भी सही सलामत है। करणी सेना का जन्म 2006 में हुआ, उससे पहले पद्मावती पर 1964 में अनीता गुहा 'महारानी पद्मिनी' में काम कर चुकी हैं। श्याम बेनेगल भी भारत एक खोज में पद्मावती से जुड़े इतिहास के इस हिस्से को दिखा चुके हैं। 25 मई से 13 अगस्त 2009 तक 'रानी पद्मिनी का जौहर' नाम से टीवी शो सोनी पर दिखाया जा चुका है। सवाल यह है कि इन तमाम फिल्मों और सीरियल को लेकर करणी सेना का खून क्यों नहीं खौला? 
और सेंसर बोर्ड कहे जाने वाला 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन' क्या कविता पाठ में लगा हुआ है? 

सच पूछें तो पद्मावती पर बनी सभी फिल्मों व सीरियल्स में कल्पना के घोड़े अधिक दौड़ाये गये हैं। अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 में चितौड़ के राणा को हराया और जनवरी 1316 में उसकी मृत्यु हो गई। मालिक मुहम्मद जायसी ने 'पद्मावत' की रचना लगभग ढाई सौ साल बाद, 1540 में की थी, जिसे हम पूरी तरह हम काल्पनिक ही मानेंगे। उस दौर में जिस रचनाकार के लिखे पर भरोसा कर सकते हैं, वे थे अमीर $खुसरो। अमीर खुसरो द्वारा लिखी पुस्तक 'खजाइन उल फतह' में चितौड़गढ़ किले की फतह की तफसील है, मगर कहीं भी रानी पद्मावती की चर्चा नहीं है। 1315 में अमीर खुसरो ने एक और किताब लिखी, 'दीवाल रानी खिज्र खान'! इस पुस्तक में अलाउद्दीन खिलजी और गुजरात की एक राजकुमारी की प्रेम कथा का है। इस पुस्तक में भी कहीं $खुसरो ने पद्मावती का नाम तक नहीं लिया है। इतिहास में पद्मावती के वजूद के होने, न होने पर हम नहीं जाना चाहेंगे। संदर्भ अंतहीन हैं।

जिसे हम जान रहे हैं, वह करणी सेना की करतूत है। 2008 में जोधा-अकबर के समय करणी सेना ने जो उत्पात किया था, उस वजह से इस जातिवादी संगठन के वजूद को लोग जान पाये। फिर 2010 में फिल्म वीर के प्रदर्शन के समय वही पंगेबाजी। करणी सेना ने प्रचार के लिए इस देश की नब्ज को पकड़ लिया है। फिल्म, टीवी या मीडिया के किसी माध्यम में उनकी जाति से संबंधित कोई भी बात कही गई हो, उस पर बखेड़ा खड़ा करो। इस घटना के बाद जातिवादी संगठनों के द्वार खुल गये हैं। मगर, कठपुतली के इस खेल में जो लोग डोर हाथ में लिये पर्दे के पीछे खड़े हैं, वे लोग अपनी राजनीति साधने के लिए देश के सामाजिक ढांचे को चरमरा देना चाहते हैं। आग तो राजस्थान के बाहर उन जगहों पर फैल चुकी है, जो राजपूत बहुल इलाके हैं। जाति, संप्रदाय की जब बात होती है, दिमाग सुन्न हो जाता है। यही तो वो लोग चाह रहे हैं, जिन्हें येन-केन-प्रकारेण गुजरात, और 2019 जीतना है!
 

Source:Agency