बेहतर भविष्य के लिए बच्चों की चिंताएं

By Jagatvisio :28-11-2017 06:36


घर और समाज में बड़े लोग अक्सर अपने से छोटे लोगों को या बच्चों को सीख देते नजर आते हैं। खासकर बच्चों के दिमाग को तो नसीहत प्राप्ति केेंद्र ही मान लिया गया है, जिसमेेंं उम्रदराज लोग हर छोटी-बड़ी बात पर ये करो और ये न करो की नसीहत डालते रहते हैं। ये कहा जाता है कि बच्चे वही सीखते हैं, जो अपने आसपास देखते हैं। तो क्या ये बेहतर न हो कि बच्चों को सीख देने की जगह समाज खुद अपने आचरण में सुधार करे, ताकि बच्चे खुद को सुरक्षित और अपने भविष्य को संरक्षित महसूस कर सकेें। फिलहाल तो ऐसा नहीं है, इसलिए कम से कम 95 प्रतिशत बच्चे आतंकवाद से चिंतित हैं और इसी तरह की फिक्र उन्हें गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी है। बीते दिनों बच्चों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ ने एक सर्वे किया, जिसमें बच्चों की ये चिंताएं जाहिर हुईं। यूनिसेफ ने भारत समेत अमरीका, ब्रिटेन, जापान आदि 13 देशों में एक आनलाइन सर्वे किया।

भारत में 1000 बच्चों के बीच यह सर्वे हुआ, जिसमें शामिल बच्चों ने हिंसा और शिक्षा को बड़ी चिंता का विषय बताया। 9 से 12 साल के बच्चों में 95 प्रतिशत बच्चे आतंकवाद को लेकर चिंतित दिखे और  48 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि उन्हें लगता है कि आतंकवाद का असर खुद उन पर भी पड़ सकता है। आज की पीढ़ी  को विश्वशांति का पाठ वैश्विक नेता खूब देते हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर तो उन्हें हर ओर हिंसा और आतंक का खूनी खेल देखने मिल रहा है। शायद ही कोई सप्ताह ऐसा बीतता हो, जब दुनिया में कोई आतंकी घटना न होती हो। हाल ही में मिस्र में भयंकर आतंकी हमला हुआ। इराक, लीबिया, सीरिया, नाइजीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इन तमाम देशों में तो हर दिन आतंकी हत्याएं होती हैं। इस सूची में अब शायद भारत का नाम भी जुड़ जाए, क्योंकि मेन लैंड यानी इंडिया को छोड़ दें तो कश्मीर में हालात बेहद गंभीर हैं। पूर्वोत्तर में स्थिति चिंताजनक है।

नक्सलप्रभावित इलाकों मेंं भी नारकीय परिस्थितियां हैं। इन सब जगहों की समस्याओं को सुलझाने के लिए ईमानदार कोशिशें हो ही नहींं रही हैं। केवल सैन्य बल बढ़ाने से चीजें नहीं सुधरेंगी, न ही खबरों को दबाने से हालात बदल जाएंगे। हमारे बच्चे देख रहे हैं कि हिंसा प्रभावित इलाकों के बच्चे कैसा नरक भुगत रहे हैं। अपने हमउम्र बच्चों की लहूलुहान तस्वीर देखकर उनके मासूम, कोमल मन पर कितना गहरा असर पड़ रहा है, यह हम अभी नहीं समझ रहे हैं। लेकिन अब, जबकि बच्चों ने आतंकवाद के लिए अपना डर जाहिर कर दिया है, तो बड़ों को एक बेहतर दुनिया बनाने की कोशिश शुरु कर देना चाहिए। 

 
बच्चों की दूसरी बड़ी चिंताएं शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी को लेकर है। सर्वे में यह बात सामने आई है कि 96 प्रतिशत बच्चे अच्छी शिक्षा मिलने के बारे में सोचते हैं, जबकि 97 प्रतिशत बच्चे गरीबी को लेकर परेशान हैं, 94 प्रतिशत बच्चों की चिंता अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर है। एक बेहतर जीवन के लिए इन बुनियादी बातों पर जब बच्चे फिक्रमंद हो सकते हैं, तो बड़ों की जिम्मेदारी निश्चित तौर पर बढ़ जाती है।  मन की बात में प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि छोटे-छोटे बच्चों को भी देश की समस्याएं पता हैं और उन्हें भी देश की चिंता है, इधर यूनिसेफ के सर्वे में भी बच्चों की दुनिया के लिए चिंता जाहिर हुई है। वैसे सर्वे में 70 प्रतिशत बच्चों ने यकीन दर्शाया है कि विश्व नेता दुनिया भर के बच्चों के लिए अच्छे फैसले लेंगे। बच्चे चाहते हैं कि हमारे नेता सबसे पहले आतंकवाद, फिर गरीबी और शिक्षा की बदतर हालत के खिलाफ कदम उठाएं। 91 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि अगर नेता बच्चों की बातों को सुनें तो यह दुनिया एक बेहतर जगह होगी। शायद समय आ गया है कि अब हम सब बच्चों की बात सुनें।
 

Source:Agency