दूसरों के हाथों में खेलती सरकार

By Jagatvisio :02-12-2017 07:30


प्याज और टमाटर, भारतीयों के खान-पान का अहम हिस्सा हैं। भारतीय रसोई इन दोनों के बिना अधूरी लगती है। लेकिन इस वक्त सरकार की नीतियों के कारण भारतीय आधा-अधूरा खाना खाकर ही काम चला रहे हैं। सब्जियां लगातार महंगी हो रही हैं, तो गृहणियों को पहले ही काफी सोच-विचार कर रसोई संभालनी पड़ रही है और अब प्याज-टमाटर की आसमान छूती कीमतों ने हालत और बिगाड़ दी है। आम मध्यमवर्गीय परिवार दो वक्त भरपेट खाना खाकर ही खुश था, लेकिन सरकार उससे ये सुख भी छीन रही है। गरीबों के लिए सब्जी-फल पहले भी विलासिता का भोजन होते थे। वे रोटी के साथ नमक और प्याज खाकर अपनी भूख शांत करते थे। अब प्याज खरीदना भी अमीरों का हक ही रह गया है। आखिर मोदी सरकार चाहती क्या है, कि आम जनता केवल उनके चुनावी भाषण सुनकर ही पेट भर ले। या यह देखकर उसकी भूख शांत हो जाएगी कि हमारे प्रधानसेवक ने अपनी अमरीकी मेहमान के साथ शाही भोज का आनंद लिया है। 

प्याज और टमाटर की बढ़ती कीमतें कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, जो यकायक आ गईं और जिनका सामना करने के लिए तैयारी करने का वक्त नहीं मिला। बीते कुछ समय से सारी सब्जियां महंगी हैं, और उनके साथ-साथ प्याज-टमाटर भी ऊंचे दामों पर बिक रहे हैं। इसका कारण यह है कि किसानों ने इस बार इनकी खेती ही कम की। केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान का ही बयान है कि प्याज का रकबा वर्ष 2016-17 के 2.65 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस साल यानी 2017-18 में घटकर 1.90 लाख हेक्टेयर रह गया है। मतलब प्याज इस बार कम उगाई गई है।

किसानों को ऐसा कदम क्यों उठाना पड़ा, सरकार को यह भी जानने की कोशिश करना चाहिए। दरअसल किसानों को अपनी उपज की सही कीमत ही नहीं मिल पाती। सरकार चाहे जितने दावे कर ले कि वह किसानों को राहत पहुंचाएगी, हकीकत यह है कि किसान घाटे में ही रह रहे हैं। कुछ महीनों पहले देश ने देखा था कि कैसे मध्यप्रदेश में किसानों ने दूध, टमाटर आदि सड़कों पर फेेंक दिए थे। किसान एक पूरे मौसम मेहनत करके फसल उपजाता है, उसे मंडी तक पहुंचाता है और बेचने पर उसकी लागत भी नहीं निकलती, तो उसका हताश होना स्वाभाविक है।

 
कई बार ऐसा भी होता है कि किसानों से उपज खरीद कर उसे सरकारी गोदामों में रख कर सड़ा दिया जाता है और उसके बाद बाजार में मांग होने पर आयात का सहारा लिया जाता है। न किसानों को बिक्री की सही कीमत मिलती है, न जनता को खरीद की सही कीमत मिलती है। केवल जमाखोरों को मुनाफा मिलता है। शायद यही वजह है कि इस बार किसानों ने प्याज और टमाटर कम उगाए। अभी एक महीना पहले 31 अक्टूबर को श्री पासवान ने प्याज और टमाटर के खुदरा भाव में बढ़ोत्तरी के लिए जमाखोरों को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने कहा था कि नई फसल की आवक शुरू होने पर स्थिति सामान्य हो पाएगी। लेकिन इस एक महीने में स्थिति नहीं सुधरी और अब मंत्री महोदय कह रहे हैं कि सरकारी एजेंसियों ने प्याज की खरीदी की है। साथ ही, प्याज का आयात भी किया गया है, लेकिन कीमतें कम करना हमारे हाथ में नहीं है। अगर ऐसा है तो वे बता दें कि आम आदमी की थाली सरकार ने किन हाथों को दे रखी है। कौन है जिसके हाथों में देश की बागडोर है।

चुनाव के वक्त तो जनता ने नरेन्द्र मोदी के हाथों ही देश की कमान सौंपी थी। लेकिन अब उनके मंत्री कह रहे हैं कि प्याज और टमाटर की कीमतें कम करना उनके हाथों में नहीं है, तो क्या कोई और है जिसके इशारों पर सरकार चल रही है, उन अदृश्य हाथों में बाजार भी है और वे ही हाथ जमाखोरों की पीठ पर भी हंै? गुजरात चुनाव में गड़े मुर्दे उखाड़ने में व्यस्त मोदीजी, थोड़ी फुर्सत पाकर जरा वर्तमान की सुध लें और अपने हाथों से जिम्मेदारी उठाएं, तो शायद जनता को फिर से भरपेट भोजन मिल सके। 
 

Source:Agency