अयोध्या में ध्वंस लगातार जारी है

By Jagatvisio :07-12-2017 07:15


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत अब नये दर्प के साथ कह रहे हैं कि अयोध्या में सिर्फ मन्दिर बनेगा, सो भी 'वहीं' तो समझा जा सकता है कि केन्द्र में नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकारें बनने के बाद से अब तक का आखिरी ध्वंस संघ परिवारियों की तथाकथित शर्म का हुआ है। आजकल वे विवाद के समाधान के नाम पर अपने तमाम खोल उतारकर सद्भाव का जामा पहनने की कोशिशों में मुब्तिला हैं और उसकी बिना पर दूसरे पक्ष का सम्पूर्ण आत्मसमर्पण चाहते हैं तो लगता है, अपनी जली हुई शर्म की राख झाड़ रहे हैं।  लेकिन वे जो भी करें, सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनके लिए सुभीते की यह स्थितियां निर्मित कैसे हुईं? 

अयोध्या को छूकर बहने वाली सरयू में छ: दिसम्बर, 1992 की त्रासदी के बाद भी ढेर सारा पानी बह चुका है। फिर भी यह सच है कि बदलने को नहीं आ रहा कि उस दिन बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना एक इब्तिदा भर थी और उसके साथ चल निकला प्रगतिशील सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व संवैधानिक मूल्यों के ध्वंस का सिलसिला अभी तक जारी है। 

हां, इधर 'नया भारत' बनाने के अभियानों के बीच यह इतना 'शातिर' कहें, 'शांत और चुपचाप' या कि 'बेआवाज' हो चला है कि कई कानों को उसकी खबर ही नहीं होती। वैसे ही, जैसे उन्मत्त कारसेवकों द्वारा 'विवादित' बाबरी मस्जिद के साथ अयोध्या की 24 अविवादित मस्जिदों पर बोले गये धावों की नहीं हुई थी और जब किशोरों, बूढ़ों व महिलाओं समेत कोई डेढ़ दर्जन 'बाबर की औलादों' की क्रूर हत्याओं की ही खबर नहीं हुई तो उनके 458 घरों व दुकानों में तोड़फोड़ व आगजनी की कैसे होती? ऐसे में मारे जाने वालों को इस विडम्बना से ही कैसे निजात मिल सकती थी कि दुनिया भर के मीडिया के अयोध्या में उपस्थित होने के बावजूद आतताइयों के हाथों उनकी जानें गंवाना खबर नहीं बन सकी। तभी तो 25 साल बाद भी यह त्रास जस की तस है कि भले ही बाबरी मस्जिद के गुनहगारों पर मुकदमे चल रहे हैं, उक्त डेढ़ दर्जन निर्दोषों के हत्यारों की खोज का एक भी उपक्रम संभव नहीं हुआ। दिखावे के लिए भी नहीं। मनुष्य के जीवन की इससे बड़ी हेठी भला और क्या हो सकती है?

प्रसंगवश, बाबरी मस्जिद के स्वामित्व सम्बन्धी विवाद में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आना अभी बाकी है, सुनवाई 8 फरवरी तक के लिए टाल दी गई है, लेकिन ध्वंसधर्मियों ने अपना फैसला पहले ही कर रखा है। अयोध्या में अब सारे के सारे रास्ते रामजन्मभूमि को ही जाते हैं। बाबरी मस्जिद की तरफ एक भी नहीं जाता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत अब नये दर्प के साथ कह रहे हैं कि अयोध्या में सिर्फ मन्दिर बनेगा, सो भी 'वहीं' तो समझा जा सकता है कि केन्द्र में नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकारें बनने के बाद से अब तक का आखिरी ध्वंस संघ परिवारियों की तथाकथित शर्म का हुआ है। आजकल वे विवाद के समाधान के नाम पर अपने तमाम खोल उतारकर सद्भाव का जामा पहनने की कोशिशों में मुब्तिला हैं और उसकी बिना पर दूसरे पक्ष का सम्पूर्ण आत्मसमर्पण चाहते हैं तो लगता है, अपनी जली हुई शर्म की राख झाड़ रहे हैं। लेकिन वे जो भी करें, सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनके लिए सुभीते की यह स्थितियां निर्मित कैसे हुईं? 

समझने चलें तो याद आता है कि विवाद में एक समय मुख्य बिंदु यह बन गया कि क्या बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी, तो राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से इस बाबत अपनी राय देने को कहा था। उस सुप्रीम कोर्ट से जो बाबरी मस्जिद के ध्वंस को 'राष्ट्रीय शर्म' की संज्ञा दे चुका था। लेकिन 1994 में उसने यह कहकर कोई राय देने से इन्कार कर दिया कि अयोध्या एक तूफान है जो गुजर जायेगा, लेकिन उसके लिए सुप्रीम कोर्ट की गरिमा और सम्मान से समझौता नहीं किया जा सकता। लेकिन अयोध्या के इस तूफान के सामने सर्वोच्च न्यायालय ने जैसी दृढ़ता दिखाई, वैसी न दूसरी अदालतों ने दिखाई और न खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली शक्तियों व सरकारों ने ही। इसलिए आज इसकी आड़ में फासीवाद की प्रतिष्ठा कर रहे संघ परिवारियों को कठघरे में खड़े करने की जरूरत है तो उनसे लड़ने का दावा करने वालों से यह पूछने की भी कि यह कैसी लड़ाई लड़ रहे हैं वे, जिसमें हर मोर्चे के बाद उनका दुश्मन बढ़ी हुई ताकत के साथ और निरंकुश होकर सामने आ जाता है? यह प्रश्न भी इसी से जुड़ा हुआ है कि अगर पुरानी रणनीति कारगर सिद्ध नहीं हो रही तो क्या उस पर पुनर्विचार करने और उसके खोट दूर करने का समय नहीं आ गया है? आखिरकार किसी भी धार्मिक व राजनीतिक संघर्ष में उससे जुड़े सामाजिक व आर्थिक पहलुओं की उपेक्षा करके कैसे विजय पाई जा सकती है?

आखिर ये शक्तियां कब समझेंगी कि 1986 में फैजाबाद की जिला अदालत के आदेश पर विवादित ढांचे के ताले खोले जाने, 1989 में विहिप द्वारा 'वहीं' मन्दिर का शिलान्यास किये जाने, मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद 1990 में उग्र कारसेवा आन्दोलन व 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस तक इन पहलुओं की एक लम्बी शृंखला है। यह शृंखला एक तरफ कांग्रेस द्वारा भाजपा से उसका हिन्दू कार्ड छीनने की कोशिशें करने व विफल होने की कहानी कहती है तो दूसरी ओर भूमण्डलीकरण की बाजारोन्मुख आंधी के अनर्थों तक भी जाती है। 

 
गौरतलब है कि यह बाजार जैसे-जैसे 'खुला' और 'उदार' हुआ, मनुष्य की सामूहिक मुक्ति की भावनाएं कमजोर करने लगा और उसका सारा जोर मनुष्य को अलग-थलग व अकेला कर नाराज भीड़ें खड़ी करने व उसकी कुंठाओं व भयों को भुनाने पर हो गया। कट्टरता और साम्प्रदायिकता इस बाजार की अभिन्न अंग बनीं तो अभी तक बनी ही हुई हैं।  

यह सिर्फ संयोग नहीं था कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व में नई आर्थिक नीतियों के उद्घोष व विरोध के बीच सरकारी दूरदर्शन ने जनवरी 1987 में हर रविवार की सुबह 'रामायण' धारावाहिक का प्रसारण शुरू किया। आज यह कहना मुश्किल है कि 'जय सीताराम' व 'राम-राम' जैसे विनम्र अभिवादनों को 'जय श्रीराम' की आक्रामकता तक यह धारावाहिक ले गया या विहिप, पर इस पर दोनों की परस्पर निर्भरता काफी कुछ कह देती है। 90-92 में विहिप के जो कारसेवक अयोध्या आये उनमें से अनेक अयोध्या में वहीं धारावाहिक वाली अयोध्या तलाशते थे जो वास्तव में कहीं नहीं थीं। 

कारसेवकों में से अधिकांश ऊंची जातियों के और खाए-पीए अघाए वर्ग के थे और मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू किये जाने से नाराज थे। वे कच्ची उम्र के बेरोजगार थे, या फिर अपने रोजगार से असन्तुष्ट। अपवाद के तौर पर ही उनमें कोई गरीब या अशिक्षित था। उनके चेहरे पर आमतौर पर गर्व का भाव होता था और वे समझते थे कि अयोध्या में अपनी सेवायें देकर वे नये इतिहास का निर्माण कर रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़ने वालों ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने की गलती की, तो उनके अयोध्या आने से वे सन्त-महंत बहुत खुश थे जो अब तक उत्तर प्रदेश व बिहार के गांवों-कस्बों के छोटे-बड़े किसानों व दुकानदारों की पीढ़ियों से हासिल हो रही पारम्परिक श्रद्धा व चढ़ावे पर गुजर-बसर करते थे। अयोध्या में अमीर कारसेवकों की आमदरफ्त बढ़ने से उनका बाजार बढ़ रहा था और उन्हें इसके लिए विश्व हिन्दू परिषद का कृतज्ञ होने में

कोई समस्या नहीं थी। 
तब पूंजी का प्रवाह अयोध्या बढ़ने से अयोध्या में नये निर्माणों की झड़ी-सी लग गयी थी। पहले जो संत-महन्त एक दो रुपयों के लिए रिक्शेवालों से किच-किच करते दिखते थे, लग्जरी कारों में नजर आने लगे और सशस्त्र गार्डों के पहरे में निकलने लगे। उनका यह रुतबा पर्यटकों व नेताओं के अलावा पत्रकारों के एक समुदाय को भी सुभीते का लगता था। धीरे-धीरे अयोध्या की टूटी-फूटी बेंचों वाली चाय की दुकानें 'श्रीराम फास्ट फूड आउटलेट्स' में बदलने लगीं और यह सिलसिला जल्दी ही रक्तरंजित इतिहास की पुस्तकों और कारसेवा के दौरान हुई पुलिस फायरिंग के अलबमों, कैसेटों और सीडियों तक जा पहुंचा। जब तक आम लोग इस सबको ठीक से समझते, बहुत देर हो गई थी। 

आज, जब इस देरी के कारण देश बेहद खतरनाक फासीवादी मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, खुद को बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष कहने वाली शक्तियों ने इन सारे परिप्रेक्ष्यों को उनकी समग्रता में नहीं समझा तो हमारा भावी इतिहास उन्हें क्षमा नहीं करने वाला।   
 

Source:Agency