ट्रंप का ट्विटर बम

By Jagatvisio :03-01-2018 07:29


साल 2018 के पहले ही दिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्विटर बम फोड़ा। उन्हें शायद अचानक यह अहसास हुआ कि अमेरिका से पाकिस्तान को जो अरबों की वित्तीय सहायता मिल रही है, उससे अमेरिका को तो घाटा हो रहा है और आतंकवादी मौज काट रहे हैं। बस फिर एक चतुर व्यापारी की तरह अपने नफे-नुकसान का आकलन करते हुए उन्होंने ट्वीट किया कि अमेरिका ने मूर्खतापूर्ण ढंग से बीते 15 सालों में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर की सहायता दी है, लेकिन बदले में हमें झूठ और छल के अलावा कुछ भी नहीं मिला। हमारे नेताओं को मूर्ख समझा गया। वे आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह देते रहे और हम अफगानिस्तान में खाक छानते रहे। अब और नहीं। ट्रंप के इस ट्वीट से पाकिस्तान में तो हड़कंप मचना ही था, दुनिया भी हैरान रह गई कि अचानक अमेरिका को ये क्या हो गया? यह तथ्य तो सभी जानते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान को खड़ा करने में अमेरिका का कितना योगदान रहा है। जब ओसामा बिन लादेन अमेरिका के लिए भस्मासुर साबित हुआ, तब उसे अहसास हुआ कि आतंकवाद के जख्म कितने गहरे होते हैं।

9। 11 की इस घटना के बाद से ही आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की लड़ाई तेज हुई, लेकिन केवल अपने लिए, बाकी दुनिया तो आतंकवाद और गृहयुद्धों की आग में झुलसती रही और अमेरिका का सीधा या छिपा हुआ दखल इस आग को और भड़काता रहा। सद्दाम हुसैन को फांसी हुई, गद्दाफी को सरेआम मारा गया, हुस्नी मुबारक सत्ता से बेदखल हो गए, लेकिन दुनिया में न वह शांति स्थापित हो पाई, न वह लोकतंत्र आ पाया, जिसको लाने का दावा अमेरिका करता रहा है। मुंबई हमलों के बाद भारत लगातार यह कहता रहा कि यह पाक प्रायोजित हमले हैं और हाफिज सईद इसका मास्टरमाइंड है। लेकिन पाकिस्तान हाफिज सईद को बचाता रहा और अमेरिका फिर भी पाकिस्तान को आर्थिक मदद देता रहा। अब अचानक अमेरिका को ऐसा क्यों लगा कि पाकिस्तान उसे मूर्ख बनाता रहा, इसका खुलासा शायद समय के साथ हो।

फिलहाल यह लग रहा है कि अपनी घटती लोकप्रियता से फिक्रमंद होकर ट्रंप ने ऐसा फैसला लिया है, ताकि अमेरिका में जनता का बड़ा वर्ग इससे खुश हो और शेष दुनिया में भी वाहवाही हो। वैसे ऐसा कदम उठाने की भूमिका ट्रंप कुछ समय से बांध ही रहे थे। अभी कुछ समय पहले ही अमरीकी राष्ट्रपति की ओर से जारी की जाने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में कहा गया था, कि हम पाकिस्तान पर आतंकवादियों को $खत्म करने के लिए जारी प्रयासों में तेजा लाने का दबाव डालेंगे क्योंकि किसी भी देश का आतंकवादियों और उनके समर्थकों के लिए कोई योगदान नहीं हो सकता है। इसके बाद दिसंबर के अंत में अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने अफगानिस्तान यात्रा के दौरान पाकिस्तान से एक बार फिर कहा था कि वो अफगानिस्तान की सरकार के खिलाफ लड़ने वाले समूहों को सुरक्षित ठिकाने मुहैया न कराए।

पेंस की इस बात से बौखलाए पाकिस्तान की ओर से बयान आया था कि उपराष्ट्रपति का ये बयान अमेरिकी प्रशासन के साथ होने वाली गहन बातचीत के है और सहयोगी दल एक दूसरे को चेतावनी नहीं देते हैं। यानी अभी हाल तक पाकिस्तान अमेरिका को अपना सहयोगी मान रहा था। अब ट्रंप के ट्वीट के बाद  पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि अमेरिका अफगानिस्तान की लड़ाई के लिए पाकिस्तान के संसाधनों का इस्तेमाल करता है और उसी की कीमत चुकाता है। उन्होंने यहां तक कहा कि ट्रंप के नो मोर का कोई महत्व नहीं है और पाकिस्तान इस तानाशाही को नहीं सहेगा।

 
ट्रंप अफगानिस्तान में हार से दुखी हैं और इसलिए वह पाकिस्तान पर दोष मढ़ रहे हैं। हमारी जमीन, रोड, रेल और दूसरी सेवाओं का इस्तेमाल किया गया और इसके बदले हमें भुगतान किया गया। इसका ऑडिट भी हुआ है। वहीं पाक रक्षा मंत्रालय ने कहा, कि अमेरिका ने हमें केवल अविश्वास दिया। अमेरिका सीमा पार स्थित आतंकवादियों के सुरक्षित पनाहगाहों को नजरंदाज करता है। वैसे इस वक्त पाकिस्तान की सत्ता में हड़कम्प मचा है। हाफिज सईद पर अचानक सख्त होते हुए पाक की वित्तीय नियामक संस्था प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसीपी) ने जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन के चंदा लेने पर प्रतिबंध लगा दिया है। जबकि इसी हाफिज सईद को पिछले महीने ही अदालत ने ससम्मान आरोपों से बरी किया था।

 एसईपी ने एक आदेश जारी किया है कि अगर प्रतिबंध के बावजूद कोई हाफिज के संगठनों को पैसा देगा तो उस पर भारी आर्थिक जुर्माने के साथ कार्रवाई की जाएगी। एसईपी की अधिसूचना के अनुसार, कंपनियों के उन सभी संस्थाओं और लोगों को चंदा देने पर रोक रहेगी, जिनका नाम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रतिबंधित की सूची में डाला है। इसमें जमात-उद-दावा के साथ-साथ लश्कर-ए-तैयबा, फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन, पासबां-ए-अहले-हदीस और पासबां-ए-कश्मीर शामिल हैं। कहा जा रहा है कि सईद के तथाकथित खैराती संगठनों के खिलाफ कार्रवाई से सरकार और सेना में तनाव बढ़ सकता है क्योंकि सेना लश्कर सरगना को राजनीति की मुख्यधारा में लाने की योजना बना रही है। 

बहरहाल, अमेरिकी सहायता बंद होने से पाकिस्तान को कितना फर्क पड़ेगा, यह कहा नहीं जा सकता, क्योंकि चीन और सऊदी अरब उसके साथ हैं। इधर भारत भी यह खुशफहमी न पाले कि उसके दबाव में ट्रंप ने यह फैसला लिया है। आर्थिक और सामरिक सौदों के कारण फिलहाल भारत अमेरिका के लिए फायदेमंद है, इसलिए यह मित्रता है। कल को अगर पाकिस्तान या अफगानिस्तान उसके लिए ज्यादा मुफीद साबित हुए, तो यह समीकरण बदल भी सकता है। 
 

Source:Agency