2018 की चुनौतियां

By Jagatvisio :05-01-2018 07:34


मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि आज उद्यमी के लिए ईमानदारी से व्यापार करना संभव नहीं है चूंकि सरकारी कर्मी हर पग पर घूस मांगते हैं। सरकार की नासमझी है कि काले धन के मूल कारण सरकारी कर्मियों को ईमानदार बताया जा रहा है और भ्रष्टाचार का जो लक्षण मात्र व्यापारी हैं उन्हें चोर बताया जा रहा है। गृहणी ने जो ईमानदारी से 10-20 हजार रुपये तिजोरी में बचाकर रखे थे वह तो काले हो गये। सरकारी बैंक कर्मी ने पुराने नोटों को बदलने मेें जो कमाई की वह 'सफेद' हो गई। इस वातावरण में भारत का व्यापारी सहम गया है। उसकी मानसिकता ऊर्जा रक्षात्मक हो गई है। वह व्यापार के झंझट से मुक्त होना चाहता है। बड़ी कम्पनियों को छोड़ दें तो देश की उद्यमिता पस्त हो गई है। 

देश की अर्थव्यवस्था स्वच्छ हो रही है। ऊंचे स्तर पर काले धन का प्रचलन कम हो रहा है। परन्तु ग्रोथ अटकी हुई है जैसे अड़ियल बैल अच्छा दाना खा कर भी चलने को तैयार नहीं होता है। 2017 की पहली तिमाही में हमारी ग्रोथ रेट 5.7 प्रतिशत थी जो कि दूसरी तिमाही में 6.3 प्रतिशत हो गयी है। परन्तु यह सुधार प्रभावी नहीं है जैसे छात्र यदि 51 के स्थान पर 56 अंक प्राप्त करे तो भी द्वितीय श्रेणी में ही पास होता है। न्यून ग्रोथ रेट का पहला कारण काले धन पर सरकार का प्रहार है। जी हां, सरकार की स्वच्छता ही सरकार को ले डूब रही है। जो व्यक्ति तम्बाकू का आदी हो जाता है उसे एक झटके में तम्बाकू देना बन्द कर दिया जाये तो वह डिप्रेशन में आ जाता है। इसी प्रकार काले धन पर वार से अर्थव्यवस्था डिप्रेशन में आ गई है।

काला धन अर्थव्यवस्था में मोबिल आयल का काम कर रहा था। जैसे मंत्रीजी और सचिवजी ने 100 करोड़ की घूस लेकर जमीन का सस्ता आबंटन कर दिया। बिल्डर को जमीन सस्ती मिल गई और उसका प्रोजेक्ट चल निकला। मंत्रीजी ने 100 करोड़ की राशि को उसी बिल्डर के प्रोजेक्ट में लगा दिया। बिल्डर का प्रोजेक्ट शीघ्र बनने लगा। वर्तमान सरकार ने इस धांधली पर विराम लगाकर आदर्श स्थापित किया है। परन्तु इस अच्छे कार्य का भी दुष्परिणाम हो रहा है जैसे तम्बाकू बन्द करने का होता है। घूस न लेने के कारण बिल्डर को जमीन महंगी लेनी पड़ रही है। किसी जानकार ने बताया कि हरियाणा में पूर्व सरकार प्रयास कर रही थी कि किसी जमीन को 100 करोड़ की घूस लेकर 200 करोड़ में बेच दिया जाये। उसी जमीन को वर्तमान सरकार ने 1000 करोड़ में बेचा।

बिल्डर को जमीन 300 करोड़ (200 करोड़ की खरीद एवं 100 करोड़ की घूस) के स्थान पर 1000 करोड़ में मिली। मंत्रीजी ने 100 करोड़ की राशि भी प्रोजेक्ट में नहीं लगाई। बिल्डर को यह रकम बैंक से लेनी पड़ी और इस पर ब्याज देना पड़ा। इस प्रकार कंस्ट्रशन का धंधा दबाव में आ गया है। कमोबेश यही कहानी दूसरे क्षेत्रों की भी है।
इस साफ -सुथरी व्यवस्था का लाभ भी हुआ है। सरकार को पूर्व में उस जमीन के 200 करोड़ मिलने थे जो अब मिले 1000 करोड़।

सरकार का राजस्व बढ़ा। मान लीजिये इस अतिरिक्त मिले 800 करोड़ रुपये का उपयोग सरकार नेे बुलेट टे्रन बनाने के लिये किया अथवा राफेल फाइटर प्लेन खरीदने के लिए किया। इन खरीद में यह रकम देश से बाहर चली गई। बुलेट टे्रन का आयात जापान से किया गया। इस प्रकार नई मांग विदेशों में बनी। जो मांग पूर्व में कंस्ट्रक्शन में घरेलू एल्युम्यूनियम और श्रम के लिए बन रही थी वह समाप्त हो गई। अर्थव्यवस्था साफ -सुथरी हो गई परन्तु मन्द पड़ गई चूंकि रकम बाहर चली गई जैसे साफ-सुथरे गुब्बारे की हवा निकल जाये। अब बुलेट टे्रन बन गई। मुम्बई से अहमदाबाद जाने में 8 घंटे के स्थान पर 3 घंटे लगने लगे। पूर्व में व्यापारी एक दिन मुम्बई से अहमदाबाद जाता था, रात वहां होटल में ठहरता था और दूसरे दिन वापस आता था। अब वह सुबह जाता है और शाम को वापस आ जाता है। अहमदाबाद के होटल का धंधा ठप्प हो गया। 2018 की चुनौती है कि साफ-सुथरी अर्थव्यवस्था को कायम रखते हुए उर्ध्वगामी दिशा दी जाये।

उपाय है कि बढ़े हुए राजस्व का उपयोग इस प्रकार किया जाये कि घरेलू अर्थव्यवस्था का चक्का घूमने लगे। जैसे छोटे शहरों में सड़क और बिजली की व्यवस्था सुधारी जाये। इन सड़कों को बनाने में सीमेंट एवं श्रम की मांग घरेलू अर्थव्यवस्था में बनेगी, बुलेट टे्रन की तरह बाहर नहीं जायेगी। छोटे शहरों में उद्योग बढ़ेगा तो अहमदाबाद के होटल ग्राहक बढ़ेंगे। छोटे शहरों में सड़क बनाने का ठेके स्थानीय ठेकेदारों को दिये जायेंगे। तात्पर्य यह कि साफ-सुथरी अर्थव्यवस्था को जो बुलेट टे्रन, आठ लेन के हाईवे, एयर पोर्ट आदि से जोड़ दिया गया है वह समस्या पैदा कर रहा है। उसी साफ-सुथरी अर्थव्यवस्था को झुग्गी और छोटे कस्बों की बिजली, लाइट एवं सड़क से जोड़ा जाये तो अर्थव्यवस्था चल निकलेगी। 'विकास' की दिशा आम आदमी की जरूरतों के अनुकूल होनी चाहिये।
 

Source:Agency