मणिपुर : जहां तिरंगा फहराया था

By Jagatvisio :11-01-2018 07:43


मोइरांग ऐतिहासिक स्थान है। इस गांव का नाम स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में होना चाहिए। 18 अप्रैल 1944 को यहां पर आजाद हिन्द फौज के मतवाले और बहादुर सैनिकों ने पहली बार भारत भूमि पर तिरंगा ध्वज फहराया था। बर्मा से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए आजाद हिन्द फौज का दस्ता मोइरांग, फिर आगे नगालैंड के कोहिमा तक पहुंच गया था। जापान के नेतृत्व में आईएनए लड़ रही थी। नेताजी का सपना था कि इस सहयोग के द्वारा वे भारत को मुक्त करा सकेंगे। सो कुछ दिनों के लिए सही मोइरांग और उसके आगे-पीछे के इलाके में आजाद हिन्द फौज द्वारा मातृभूमि को आजाद कर लिया गया था। यह अलग बात है कि स्वतंत्रता मिलने का दिन अभी दूर था।

मणिपुर में एप्सो की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के लिए देश के लगभग बीस प्रांतों से प्रतिनिधि आए थे। हममें से अधिकतर की यह पहली मणिपुर यात्रा थी इसलिए औपचारिक बैठकों के बाद जब दो-एक दर्शनीय स्थलों के भ्रमण की सूचना मिली तो सबके सब बहुत उत्साहित हुए। हमें जाना बहुत दूर नहीं था। इम्फाल से कोई पैंतालीस किलोमीटर दूर मोइरांग और वहां से दस किलोमीटर आगे लोकटाक झील। एक दिन में इससे अधिक देख भी क्या सकते थे? शाम होते-होते तक लौटना भी था। मणिपुर पूर्व में है इसलिए हमारी घड़ी से सूर्योदय पांच बजे के पहले हो जाता है और शाम चार-साढ़े चार बजे से अंधेरा घिरने लगता है। लोग-बाग अपना काम समेटने लगते हैं और छह बजे तक सड़कें वीरान हो जाती हैं। हम लोग नौ तारीख की सुबह चलने के लिए तैयार थे किन्तु पिछली रात से बारिश होना शुरू हो गई थी और रुकने का नाम नहीं ले रही थी। लेकिन हमारे उत्साह में कोई कमी नहीं थी। छाता मिल गया तो ठीक नहीं तो भीगते-भागते बसों और अपनी गाड़ियों में बैठ गए।

मणिपुर के साथियों ने बताया कि इस समय यह बारिश असामान्य हैं, जब जाड़ा पड़ने लगता है तब यहां बारिश नहीं होती है। इस बात से यही निष्कर्ष निकाला कि बदलते मौसम के असर से कोई भी इलाका बच नहीं पा रहा है। इम्फाल शहर पार किए कुछ किलोमीटर ही हुए होंगे कि विष्णुपुर जिला प्रारंभ हो गया। यहां से ग्रामीण जीवन की छटा देखने मिली। पुरानी शैली के टीन की छत वाले मकान, अनेक घर मिट्टी के ही थे। साधन-सम्पन्न लोगों के घर अवश्य पक्के बने थे। इस रास्ते पर मोइरांग के पहले जिन गांवों से गुजरे उनमें सब जगह महिलाएं ही दुकानदारी करते दिखीं। हर गांव में पुलिस का भी ऐसा बंदोबस्त देखने मिला जो सामान्यत: हम अपने यहां नहीं देखते। प्राय: हरेक गांव में जलापूर्ति के लिए सरकार द्वारा निर्मित जलाशय देखने में आए। उन पर बाकायदा सूचनाफलक लगे थे कि गांव की जलप्रदाय व्यवस्था के लिए इन्हें बनाया गया है। मोइरांग पहुंचने के लगभग दस किलोमीटर पहले लोकटाक झील का एक सिरा दिखाई देने लगा था।

मोइरांग ऐतिहासिक स्थान है। इस गांव का नाम स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में होना चाहिए। 18 अप्रैल 1944 को यहां पर आजाद हिन्द फौज के मतवाले और बहादुर सैनिकों ने पहली बार भारत भूमि पर तिरंगा ध्वज फहराया था। बर्मा से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए आजाद हिन्द फौज का दस्ता मोइरांग, फिर आगे नगालैंड के कोहिमा तक पहुंच गया था। जापान के नेतृत्व में आईएनए लड़ रही थी। नेताजी का सपना था कि इस सहयोग के द्वारा वे भारत को मुक्त करा सकेंगे। सो कुछ दिनों के लिए सही मोइरांग और उसके आगे-पीछे के इलाके में आजाद हिन्द फौज द्वारा मातृभूमि को आजाद कर लिया गया था। यह अलग बात है कि स्वतंत्रता मिलने का दिन अभी दूर था। आईएनए की इस मुहिम में देश के सभी भागों के सैनिक थे जो सिंगापुर और मलाया में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के आह्वान पर ब्रिटिश फौज छोड़कर चले आए थे।

मोइरांग की अस्त-व्यस्त नगरीय संरचना के बीच एक संकरी सड़क पर आजाद हिन्द फौज का स्मारक बना है। इस जगह पहुंच कर हमारा हृदय रोमांचित हो उठा और आजादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए अपने आप माथा झुक गया। जिस जगह तिरंगा फहराया गया था वहां कॉटेजनुमा एक कक्ष बना हुआ है। इसके सामने एक अन्य स्मारक है। नेताजी ने सिंगापुर में 6 जुलाई 1945 को आईएनए के शहीदों के लिए एक स्मारक की बुनियाद रखी थी। श्रीमती इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद उस स्मारक की प्रतिकृति यहां स्थापित करने का निर्णय लिया, जिसकी आधारशिला तत्कालीन केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री के.के. शाह के द्वारा रखी गई और 23 सितंबर 1969 को इंदिराजी ने स्वयं यहां पहुंच कर इस शहीद स्तंभ का अनावरण कर उसे देश को समर्पित किया। हम सबने यहां अपने वीर शहीदों को फूल चढ़ाकर उन्हें सलामी दी।

मुझे यह बताना चाहिए कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और आजाद हिन्द फौज दोनों की स्मृति में यहां एक विस्तृत परिसर विकसित किया गया है जिसमें ध्वाजारोहण स्थल और शहीद स्तंभ तो हैं ही, उनके अलावा कुछ और भी है। यहां एक सुसज्जित प्रेक्षागृह और साथ में एक पुस्तकालय है। इसका नाम नेताजी लाइब्रेरी है। 1968 में आजाद हिन्द फौज की रजत जयंती के अवसर पर इंदिरा सरकार के एक अन्य वरिष्ठ मंत्री और जाने-माने विद्वान डॉ. त्रिगुण सेन ने 21 अक्टूबर को ही इस लाइब्रेरी का लोकार्पण किया था। यह नोट करने योग्य है कि प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आजाद हिन्द फौज तथा आजाद हिन्द की अस्थायी सरकार की रजत जयंती के  अवसर पर अपने दो वरिष्ठ मंत्रियों को इस ऐतिहासिक स्थान पर भेजा और एक तरह देश की आजादी की लड़ाई में नेताजी के अविस्मरणीय योगदान को न सिर्फ रेखांकित किया बल्कि देशवासियों को उसका पुनर्स्मरण कराया।

 
इस परिसर में आईएनए वार म्यूजायम अर्थात आजाद हिन्द फौज युद्ध संग्रहालय भी अवस्थित है। संग्रहालय में नेताजी से संबंधित बहुत सारी सामग्रियों को प्रदर्शित किया गया है। उनके विभिन्न अवसरों पर लिए गए चित्र हैं, अखबारों की कतरनें हैं, आईएनए की यूनिफार्म और हथियार आदि हैं, उनके परिवार के सदस्यों के भी बहुत से चित्र हैं। एक चित्र नेताजी की इकलौती संतान अनिता बोस का भी है। वह चित्र भी है जिसमें नेताजी सैगॉन में विमान में चढ़ रहे हैं। यह उनके पार्थिव जीवन की आखिरी स्मृति है। बहुत से चित्र मणिपुर के उन नागरिकों के भी थे जो आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए थे और बाद में अंग्रेज सरकार के कोपभाजन बने। ये सब सामान्यजन थे, फौजी नहीं लेकिन नेताजी के आह्वान पर देश को आजाद कराने की लड़ाई में कूद पड़े थे।

एक कक्ष में मणिपुर के पुराने राजा-महाराजाओं के चित्र थे। प्रदेश के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के भी। मेरी निगाह इस कक्ष में तीन चित्रों वाले एक पैनल पर अटक गई। ये तीनों मणिपुरी साहित्य के श्लाका पुरुष थे। महाकवि हिजाम अंगंगहाल, कवि चाओबा और कवि कमल। मणिपुरी साहित्य से मेरा परिचय लगभग शून्य है, लेकिन कवियों के चित्र देखकर प्रसन्नता हुई। संग्रहालय की सीढ़ियों से हम नीचे उतरे।  नेताजी की आदमकद मूर्ति को एक बार फिर सलाम किया। बारिश थम नहीं रही थी और इस भावुक अनुभव के बावजूद हमारा उत्साह कायम था। हम अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े। लोकटाक झील के दर्शन जिस बिन्दु से करने थे वह पन्द्रह मिनट की दूरी पर था। यहां दो फर्लांग के करीब ऊपर चढ़ना था जहां से झील अपनी पूरी भव्यता के साथ दृष्टिगोचर होती है। मुझे लगा कि जिस सड़क से हम जा रहे हैं उसे झील के एक हिस्से को पाटकर ही बनाया गया है। यद्यपि इस बारे में मुझे सही जानकारी नहीं है।

लोकटाक अपने तरह की एक अनूठी झील है। इसका विस्तार दो सौ वर्ग किलोमीटर या उससे कुछ अधिक है और जलग्रहण क्षेत्र उससे पांच गुना याने एक हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है। यह पूर्वोत्तर भारत की संभवत: एकमात्र ताजे पानी की झील है और उसके बीच में बहुत सारे तैरते हुए द्वीप हैं। हम ऊपर जिस व्यू पाइंट पर थे वहां से झील तीन तरफ दिखाई दे रही थी और कुछ नन्हे द्वीप भी। इन द्वीपों पर अधिकतर मछुआरे रहते हैं और अपना जीवनयापन करते हैं। झील में खरपतवार बहुत है जिसकी बीच-बीच में सफाई चलते रहती है। हमें एक द्वीप और जाना था जहां मणिपुर का राज्य पशु संगाई पाया जाता है। यह हिरण की प्रजाति का पशु है। खराब मौसम के कारण स्टीमर चलना बंद थे अत: हम एक अनूठे अनुभव से वंचित रह गए। झील का विस्तार और उसका नीला जल आकर्षित करता है, किन्तु मुझे लगता है कि अगर ठीक से देखभाल नहीं की गई तो इसे नष्ट होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

इस यात्रा वृत्तांत की अंतिम बात मणिपुर के व्यंजनों के बारे में। लोकटाक झील के नीचे ही हमारे स्वागत में मणिपुर की पारंपरिक रसोई की व्यवस्था की गई थी। थाली के आकार में गोल कटे केलों के पत्तों पर जिसमें एक बहुत तीखी मिलवां सब्जी थी। स्थानीय वनस्पतियों से बनी एक बारीक सी सलाद, सफेद भात, दाल और मटर के साथ काला भात और खीर, और न जाने क्या-क्या। हां! इस शाकाहारी भोजन में मछली भी थी जिसे मणिपुर और बंगाल में शाकाहारी ही माना जाता है।lalitsurjan@gmail.com
 

Source:Agency