क्या हम चीन पर भरोसा कर सकते हैं?

By Jagatvisio :06-02-2018 07:45


डोकलाम यद्यपि भूटान का भाग है। परन्तु भूटान के साथ एक संधि हुई है कि डोकलाम और उससे लगे क्षेत्र को भारत पूरी तरह सैनिक सुरक्षा देगा। इसलिए यह सोचना कि चीन के साथ हमारी दोस्ती पहले की तरह कायम हो गई, उचित नहीं है। चीन डेग डेग पर हमारे साथ धोखा करता रहेगा, खासकर जब से चीन और पाकिस्तान की दोस्ती पक्की हुई है तब से हमारी कठिनाईयां और भी बढ़ गई है। इस संदर्भ में हर भारतवासी को सतर्क रहने की आवश्यकता है। क्योंकि चीन और पाकिस्तान दोनों हमारे कट्टर दुश्मन हैं। हमें दृढ़ता से इन दोनों का मुकाबला करना होगा। 

हम तो यह मान कर बैठे थे कि डोकलाम का विवाद सदा के लिये सुलझ गया है। 73 दिनों तक भारत और चीन की सेना आमने सामने रही। फिर एकाएक चीन ने अपने निर्माण कार्य को रोक दिया। इससे दोनों पक्षों के सैनिक पीछे हट गये। परन्तु चीन ने अपनी आदत के अनुसार धोखा किया और वहां आधारभूत संरचनाए खड़ी कर अपनी पकड़ मजबूत बना ली। डोकलाम में चीन ने 7 हैलीपेड बना लिये। दुर्भाग्यवश भारत को इसका पता नहीं चल सका। पश्चिम के देशों के समाचारपत्रों में यह खबर प्रकाशित हुई है कि डोकलाम क्षेत्र में एक बार चीन ने फिर से हलचल शुरू कर दी है और निर्माण कार्य जोर शोर से कर रहा है। यह पूरी तरह धोखा है। परन्तु भारत सरकार ने दृढ़ता से कहा है कि यदि चीन ने कोई घुसपैठ करने की कोशिश की तो उसका दृढ़ता से मुकाबला किया जाएगा। 

भारत के विरोध करने पर चीन ने कहा कि वह तो अपने क्षेत्र में निर्माण कार्य कर रहा है। अपने जवानों के लिये बंकर बना रहा है और वहां पर रहने वाली चीनी जनता के लिये कुछ निर्माण कार्य किये जा रहे हैं। यदि कोई पड़ोसी देश इसमें टांग अड़ाता है तो चीन इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। अभी कुछ दिन पहले भारतीय सेना के प्रमुख विपीन रावत ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि चीन की तरफ  कुछ अस्थायी निर्माण हो रहे हैं जो चिन्ता की बात है। जनरल रावत के इस बयान पर कि डोकलाम एक विवादित क्षेत्र है, चीन के प्रवक्ता ने कहा कि भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के इस बयान से साफ  है कि उन्होंने सीमा पार की थी और इससे भारत और चीन के रिश्ते मुश्किल में पड़ गये हैं। चीन उम्मीद करता है कि भारतीय पक्ष इससे कुछ सबक लेगा। कहने का अर्थ है कि चीन पहले की तरह ही घुसपैठ पर आमदा हो गया है। वह भारत को हर तरह से परेशान करने पर तुला हुआ है। खासकर जब से उसकी पाकिस्तान के साथ नजदीकी हो गई है वह भारत को अपना कट्टर दुश्मन समझकर समय समय पर घुसपैठ करने से बाज नहीं आता है। 

नई पीढ़ी के लोगों को शायद यह पता नहीं होगा कि पंडित नेहरू की एक छोटी सी भूल के कारण हमने तिब्बत खो दिया। पंडित नेहरू ने चीन के इतिहास को सही परिपेक्ष में कभी नहीं पढ़ा। वे एक भावुक व्यक्ति थे और अपने जीवन का एक बहुत बड़ा भाग उन्होंने अंग्रेजी जेल में कष्टदायक स्थिति में बिताया था। उनका मानना था कि भारत की तरह चीन भी पश्चिमी उपनिवेशवादियों का शिकार है और जब भारत और चीन आजाद हो जाएंगे तो दोनों कंधे से कंधा मिलाकर एशियाई देशों के विकास में योगदान देंगे। परन्तु उनका यह मानना सरासर गलत था। चीन सदा से विस्तारवादी देश रहा है। जब चीन में 'क्योंमिन तांगÓ की सरकार थी उस समय भी उसने भारत के साथ सीमा विवाद को सही ढंग से सुलझाने में योगदान नहीं दिया था। उस समय शिमला के एडमिनिस्टेटर मैकमेहोन ने शिमला में तिब्बत, चीन और अंग्रेजों का एक सम्मेलन बुलाया था जिसमें तिब्बत तो शामिल हुआ था और उसने मैकमेहोन द्वारा खींचें गये मानचित्र की रेखा सीमा को मान लिया था। परन्तु चीन उसमें शामिल नहीं हुआ और उसने कहा कि वह मैकमेहोन लाइन को मानता ही नहीं है। पंडित नेहरू को यह समझ लेना चाहिये था कि चीन में चाहे कोई भी सरकार रही हो वह शुरू से विस्तारववादी रहा है। 

 
भारत 1947 में आजाद हुआ। उसके दो वर्ष बाद चीन की मुख्य भूमि पर साम्यवादियों का राज हो गया और देखते ही देखते साम्यवादी सरकार ने तिब्बत को हड़प लिया। चीन की साम्यवादी सरकार ने भारत के विरोध करने पर पंडित नेहरू को समझाया कि तिब्बत की 'स्वायत्ता' कायम रहेगी और चीन की साम्यवादी सरकार उसके आंतरिक मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी। परन्तु यह सरासर एक धोखा था। दुर्भाग्यवश पंडित नेहरू ने चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ एन लाई की बातों पर भरोसा कर लिया। उस समय तिब्बत भारत का भूटान की तरह एक 'प्रोक्टोरेट' था। वहां पर अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय शासन चलता था। भारत की रेलें थी। भारत के पोस्ट ऑफिस थे और सेना की एक टुकड़ी आत्म रक्षा के लिये थी। तिब्बत की सुरक्षा पूर्ण रूप से भारतीय सैनिकों के हवाले थी। परन्तु जब चीन ने तिबबत को हड़प लिया और पंडित नेहरू को झूठमूठ आश्वासन दिया कि तिब्बत की स्वायत्ता बनी रहेगी तब पंडित  नेहरू ने इस पर विश्वास कर लिया। लेकिन चीन की साम्यवादी फ ौज ने तिब्बत के बौद्ध मठों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया।

दलाई लामा के गुप्तचरों ने उन्हें सूचना दी कि चीन की सेना उन्हें कैद करके बिजिंग ले जाएगी। यह खबर मिलते ही रातों रात दलाई लामा घोड़ों पर सवार होकर अपने कुछ सैनिकों के साथ सीमा पार कर भारत आ गये और तत्कालीन भारत सरकार ने उन्हें राजनैतिक शरण दे दी। यह जानकर चीन की साम्यवादी सरकार जलभुन गई और उसने बार बार पंडित नेहरू से मांग की कि दलाई लामा को वापस तिब्बत और चीन भेजा जाए। पंडित नेहरू इसके लिये तैयार नहीं थे। पंडित नेहरू को यह विश्वास नहीं था कि चीन कोई बहाना बनाकर 1962 में भारत पर आक्रमण कर देगा। भारत की सेना चीन से लड़ने के लिये तैयार नहीं थी। अंत में हमारी सेना को मुंंह की खानी पड़ी और वह बुरी तरह पराजित हो गई। 

इसमें कोई शक नहीं कि चीन की धोखेबाजी के कारण पंडित नेहरू को भयानक सदमा लगा था और उसी सदमें के कारण 1964 में उनकी मृत्यु हो गई। जब 1962 का चीन और भारत के बीच युझ हुआ था तब चीन ने भारत की सैंकड़ों किलोमीटर जमीन हड़प ली थी और इतने दिनों तक झूठ मूठ का दोस्ती का बहाना करके बातचीत का ढोंग करता रहा। परन्तु उस क्षेत्र को कभी नहीं लौटाया। अरूणाचल प्रदेश पर चीन हमेशा से अपना दावा ठोकता रहा है और जब भी भारत के कोई नेता अरूणाचल प्रदेश जाते हैं तो उसका चीन घोर विरोध करता है। 

डोकलाम यद्यपि भूटान का भाग है। परन्तु भूटान के साथ एक संधि हुई है कि डोकलाम और उससे लगे क्षेत्र को भारत पूरी तरह सैनिक सुरक्षा देगा। इसलिए यह सोचना कि चीन के साथ हमारी दोस्ती पहले की तरह कायम हो गई, उचित नहीं है। चीन डेग डेग पर हमारे साथ धोखा करता रहेगा, खासकर जब से चीन और पाकिस्तान की दोस्ती पक्की हुई है तब से हमारी कठिनाईयां और भी बढ़ गई है। इस संदर्भ में हर भारतवासी को सतर्क रहने की आवश्यकता है। क्योंकि चीन और पाकिस्तान दोनों हमारे कट्टर दुश्मन हैं। हमें दृढ़ता से इन दोनों का मुकाबला करना होगा। 

Source:Agency