शेयर बाजार और पकौड़े का मजा

By Jagatvisio :07-02-2018 08:19


शेयर बाजार के निवेशकों के लिए मंगलवार का दिन मंगलमय नहीं रहा। मंगलवार को शेयर बाजार सेंसेक्स के लगभग 1200 अंक की गिरावट के साथ शुरु हुआ। निफ्टी 386 अंक गिरकर शुरू हुआ। सेंसेक्स में शुरुआती गिरावट जारी रही और यह 1250 अंक तक गिर गया। इस गिरावट के चलते निवेशकों के करीब 5 लाख करोड़ रुपए डूब चुके हैं। इतनी बड़ी रकम के डूबने का मतलब है लाखों छोटे निवेशकों को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा होगा। शेयर बाजार के खेल को जो लोग अच्छे से समझते हैं और उसके नियमों को तय करने में जिनकी खास भूमिका रहती है, वे अलबत्ता फायदे में रहे होंगे। आखिर रकम किसी बरमूडा ट्राएंगल या अंतरिक्ष के शून्य में तो विलीन नहीं हुई है। किसी ने अपनी कमाई खोई होगी, तो वह धन किसी और की जेब में गया ही होगा। ये और बात है कि शेयर बाजार के झटकों को सबका नुकसान मानकर यह देखा ही नहीं जाता कि आखिर इसमें फायदा किसका हुआ है। 90 के दशक से शेयर बाजार को विकास और अर्थव्यवस्था में गति का पैमाना बनाकर जनता के सामने पेश किया जाता रहा है।

शेयर बाजार की उछाल को अर्थव्यवस्था की उछाल मान लिया जाता है। लेकिन यह भी तो देखना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि किसी कंपनी का शेयर अचानक बढ़ता है, उसकी बिक्री को महत्व दिया जाता है, और फिर अचानक किसी दिन झटके से वही शेयर नीचे गिर जाता है। नतीजा यह होता है कि महंगी दर पर खरीदा गया शेयर औने-पौने दाम पर बेचने के लिए निवेशक को उकसाया जाता है। इस खेल में निवेशक की जेब से निकला पैसा कंपनी के खाते में चला जाता है और वह समझता है कि शेयर बाजार में आई गिरावट से उसे नुकसान हुआ है।

शेयर बाजार कोई प्रकृति की बनाई चीज नहीं है कि इस पर आई आपदा के आगे इंसान बेबस हो जाए। यह तो कुछ इंसानों द्वारा बाकी इंसानों से मुनाफा कमाने के लिए बनाया गया बाजार है, जिसमें नियम इसे चलाने वाले खिलाड़ी ही तय करते हैं। सेबी जैसी संस्थाएं जरूर रेफरी की भूमिका में रहती हैं, लेकिन उनका दायरा भी सीमित ही होता है। और सरकारों का काम तो शेयर बाजार ने आसान कर ही दिया है। वह कहता है आर्थिक प्रगति हो रही है, तो सरकार भी यही कहती है। वह कहता है नुकसान हुआ है, और हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं, तो सरकार उसका ठीकरा वैश्विक बाजार पर फोड़ देती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। 

भारतीय शेयर बाजार के गिरने का कारण डाऊ जोंस में आई गिरावट को माना जा रहा है। डाऊ जोंस अमेरिका का शेयर बाजार है। हमने बहुत मामलों में अमेरिका के नक्शेकदमों पर चलना शुरु कर दिया है। मंगलवार को भारतीय बाजार गिरा और इससे एक दिन पहले सोमवार को अमेरिकी बाजारों में 6 साल की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। अमेरिकी बाजारों ने पिछले एक साल में जितनी बढ़त बनाई थी, वह इस एक दिन में की गिरावट में गंवा दी।

 
अमेरिका के लिए यह धक्का इतना जबरदस्त था कि राष्ट्रपति का भाषण लाइव दिखा रहे अमरीकी समाचार चैनलों ने उन्हें स्क्रीन से हटाकर स्टॉक मार्केट में आई रिकॉर्ड गिरावट का कवरेज दिखाना शुरू कर दिया। मोदी सरकार की तरह ट्रंप सरकार भी डाऊ जोंस की बढ़त पर गदगद होती रही है। लेकिन इस गिरावट का जिम्मा अमरीकी सरकार भी नहीं उठाना चाहती। व्हॉइट हाउस के एक प्रवक्ता का कहना है कि स्टॉक मार्केट में वक्त-वक्त पर गिरावट होती रहती है लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप का फोकस अर्थव्यवस्था के दीर्घकालीन पहलुओं पर है और वो असाधारण रूप से मजबूत बना हुआ है। ऐसी बातें सुनकर लगता है मोदी सरकार-ट्रंप सरकार में कोई गहरी रिश्तेदारी है।

भारतीय बाजार में गिरावट पिछले हफ्ते से ही चल रही थी, और वित्त मंत्री इसके लिए वैश्विक बाजार को ही जिम्मेदार मान रहे थे। लेकिन इस बात से वे कैसे इंकार करेंगे कि उनके बजट ने भी शेयर बाजार को फील बैड कराया और उसके गिरने का सिलसिला जारी रहा है। बजट के दिन सेंसेक्स में 500 अंक तक टूट गया था जबकि अगले दिन शुक्रवार को सेंसेक्स करीब 850 अंक लुढ़ककर 35,066 के नीचे आ गया । वहीं निफ्टी में भी करीब 255 अंकों की गिरावट के साथ 10,760 तक आ गिरा। यह अगस्त 2017 के बाद मार्केट में पहली सबसे बड़ी गिरावट थी। दरअसल 2018-19 के बजट में सरकार ने शेयरों पर 10 प्रतिशत का पूंजीगत लाभ कर (कैपिटल गेन टैक्स) लगाने का प्रस्ताव किया है। इससे निवेशक चिंतित हैं। इसके अलावा राजकोषीय घाटे के लक्ष्य से चूकने से भी बाजार प्रभावित हुआ है।

शेयर बाजार के दलालों का कहना है कि निवेशकों ने रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा से पहले सतर्कता का रुख अपनाया हुआ है। उनका मानना है कि मुद्रास्फीति को लेकर बढ़ती चिंता की वजह से केंद्रीय बैंक रेपो दर बढ़ा सकता है। शेयर बाजार की इस गिरावट के साथ ही रुपए का अवमूल्यन हुआ है, यानी डालर के मुकाबले उसकी कीमत घटी है। हमारा शेयर बाजार औंधे मुंह गिर रहा है, हमारी मुद्रा की कीमत कम हो रही है, लेकिन इसके बावजूद सरकार यह नहीं मानेगी कि अर्थव्यवस्था भी कमजोर हुई है। सरकार आज की नहीं, दीर्घकालीन नीतियों की बात करती है। लेकिन मोदीजी यह याद रखें कि पकौड़ा भी तुरंत बना, गर्मागर्म ही अच्छा लगता है। लंबे समय तक उसे रखें तो उसका मजा नहीं लिया जा सकता। 

Source:Agency