आखिर क्यों नहीं हुआ हिमपात?

By Jagatvisio :08-02-2018 08:37


पश्चिमी हिमालय तथा तिब्बत में इस बार हिमपात या तो हुआ ही नहीं, या फिर न्यूनतम हुआ। हिमालय की कोई भी घटना कभी स्थानीय नहीं होती। इसका असर पूरे देश पर पड़ता है। यह देश के लिए एक स्थायी एयर कंडीशनर और वाटर टैंक का काम करता है। एशिया से यूरोप तक जुड़े महासागरों का पेट सर्वाधिक हिमालय से निकलने वाली नदियां भरती हैं। इस साल कम बर्फबारी का अर्थ है, गंगा, यमुना, महाकाली, ब्रह्मपुत्र और तीस्ता जैसी नदियां और दुबली हो जायेंगी। इन नदियों के पठारों पर हाहाकार मचेगा और समुद्र अधपेट रहेंगे।

आज जो नौबत आई है उसके प्रति विज्ञानी और पर्यावरण प्रहरी कम से कम 40 दशक से चीख रहे हैं। देर से ही सही लेकिन पर्यावरणविदों की चीख-पुकार से भारत में हिमालय के वनों की कटाई पर रोक लगी। जबकि नेपाल और तिब्बत में इन दशकों में जंगलों की हजामत और तेज हुई। नेपाल से भारत की ओर आने वाली महाकाली, करनाली, गंडक आदि नदियों पर इसका सीधा असर पड़ा, तो तिब्बत मानसरोवर से निकलने वाले महानद ब्रह्मपुत्र के आकार और स्वरूप में अद्भुत बदलाव आया है। बरसात में ब्रह्मपुत्र रौद्र रूप ले लेता है, तो सर्दियों में सिमट जाता है।


भारत के हिमालय से चीन के तिब्बत तक पहुंचने में कई दिन लग जाते हैं, लेकिन दोनों की आसमानी दूरी इतनी न्यून है कि गोमुख के शिखर से यदि कोई उस ओर जोर लगा कर पत्थर फेंके, तो वह सीधे मानसरोवर में जा गिरेगा। बहुत कम लोगों को यह विदित होगा, कि गंगा और ब्रह्मपुत्र का मूल स्रोत एक ही है। भूमि के ढलान के कारण एक नदी बह कर गोमुख से भारत की ओर निकल आती है, तो दूसरी तिब्बत की ओर। भूगोल का यह सिद्ध नियम है कि जो दो नदियां एक ही उद्गम से निकलती हैं, वे हजारों मील दूर ही सही, आपस में मिलती अवश्य हैं, जैसे गंगा और ब्रह्मपुत्र। खैर, मौजूदा चिंताजनक स्थिति केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में विद्यमान है।

कनाडा में कम बर्फबारी के कारण हाल में ग्लेशियर खिसक कर पीछे हट गया। इस ग्लेशियर से निकलने वाली स्लिम्स नदी ने अपना रास्ता बदल दिया। चार दिन के भीतर ही स्लिम्स नदी का पुराना प्रवाह पथ पूरी तरह सूख गया। नेचर माइंड पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार कई जल और थल जंतुओं ने दम तोड़ दिया। नदी तट की आबादी त्राहि-त्राहि कर उठी। ये सब वैश्विक जलवायु परिवर्तन के परिणाम हैं। यूरोप की अल्पाइन पर्वत शृंखला में ग्लेशियर पिघलने से कई साल पुराने गुमशुदगी के मामले सुलझ गए। सौ साल पहले बर्फ में दबे कई कंकाल बरामद हो गए। वहां की पुलिस इससे राहत की सांस ले सकती है। समझा जा सकता है कि यह स्थिति पूरे विश्व के लिए किस भयावह खतरे का संकेत दे रही है।


पश्चिम के देशों में जंगल भले ही हरे-भरे दिखते हैं और नदियां सुनील। लेकिन वस्तुत: वे जंगल नहीं, अपितु पेड़ों के खेत हैं। वहां एकल प्रजाति के पेड़ हैं, भारत की तरह जैविक विविधता वाले नहीं। लगभग दो सदी पूर्व औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप वे लोग एक बार अपने जंगलों का सफाया कर चुके हैं। अब वहां अधिसंख्य प्राकृतिक वन नहीं अपितु रोपे हुए वृक्ष हैं। इसी तरह उनकी नदियों को नहर कहना अधिक उपयुक्त होगा। हमारी नदियां भले ही बाढ़ लाती हैं और जहां-तहां तटबंध तोड़ देती हैं, लेकिन कमोबेश उनका प्राकृतिक स्वरूप अभी तक विद्यमान है।

बड़ी वजह यह है कि हमारे पक्ष में जलवायु है, उनके नहीं। अत: हम उनकी राह क्यों चलें? लौट कर अपने घर की बात करें। हमारे हिमालय की बर्फ सिर्फ आंखों को सुकून देने और पर्यटकों को लुभाने की वस्तु नहीं है। हिमालय को देवातत्मा कहने के पीछे सिर्फ धार्मिक दृष्टि नहीं है। यह हमारे लिए जीवनदायी जल का स्रोत है। भारत की 60 फीसदी आबादी हिमालय के जल से सिंचित और पोषित है। बर्फ कम गिरना और ग्लेशियरों का छीजना प्राकृतिक नहीं, अपितु मानव निर्मित आपदा है। हिमालय की तराई में बसे नगरों, महानगरों में हाल के वर्षों में आबादी के अंधाधुन्ध विस्तार के कारण सघन वन कटे हैं।

तराई के ये वन मैदानों की लू को हिमालय की ओर जाने से रोकते थे। अब वनों की यह रक्षा पंक्ति क्षीण हो चली है। जिस तरह हमारे कंधे या पांव पर लगी चोट सर को भी भन्ना देती है, उसी तरह तराई के मैदानों में होने वाली कथित विकास की प्रकृति द्रोही गतिविधियां हिमालय को झकझोर रही है। बात सिर्फ इतनी नहीं है। उत्तराखण्ड के सुदूर उच्च शिखरों तक हर मौसम के अनुकूल रोड बनाने की कवायद जोर-शोर से चल रही है। अर्थात अब साल भर हम पर्यटन पशु बन कर पर्वत शिखरों पर दनदनाएंगे।


 
बुनियादी बात भी हम नहीं समझ पा रहे कि जिस तरह रात को कम से कम छह घण्टे हमें आराम चाहिए, उसी तरह शरद ऋतु के चार महीनों में प्रकृति बर्फ की ठंडी चादर ओढ़ सोती है। यदि हम उसे बारहों मास, अहिर्निश जगाए रखेंगे, तो क्या वह झल्लायेगी नहीं? हिमालय में गंगा और ब्रह्मपुत्र का आकाश, सर्वाधिक प्रदूषित है। इसकी वजह कार्बन के कण हैं, जो बादलों को पसीजने नहीं देते। यह सभ्यता का एक मनोवैज्ञानिक क्षण है। हमें तय करना है, कि हमें कुछ वर्षों की चकाचौंध वाला कृत्रिम विकास और समृद्धि चाहिए या भावी पीढिय़ों के लिए भी कुछ बचा कर रखेंगे।

Source:Agency