पकौड़े सा तला जा रहा समाज

By Jagatvisio :10-02-2018 08:27


वर्तमान शासन प्रणाली का नवाचार यह है कि यह कमोबेश संवेदनाशून्य बनता जा रहा है। पकौड़े बेचना न तो कोई खराब व्यवसाय है और न ही तुच्छ। परंतु यदि सरकारें अपने वायदों को पूरा करने में असफल रहती हैं और विषमता को परिहास में परिवर्तित करती हैं तो यह अक्षम्य है। चलिए हम मान लेते हैं कि भारत के 12 प्रतिशत बेरोजगार पकौड़़े का ठेला लगा लेते हैं और बाकी 88 प्रतिशत पकौड़े खाकर उनको व्यवसाय देते हैं। परंतु विवशता यह है कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बावजूद आज भी हॉकर्स और पटरी पर व्यवसाय करने वालों के पास कोई अधिकार नहीं है। प्रत्येक हॉकर आज रिश्वत देता है तभी व्यवसाय कर पाता है और उस पर भी यह डर हमेशा बना रहता है कि उसे कब बेदखल कर दिया जाएगा। 

यदि तुम्हारा मुख भोजन से पूर्ण हो, तो तुम किस तरह खा सकते हो? यदि तुम्हारे हाथों में सोना भरा हो, तो वे कब और किसे आशीर्वाद देने के लिए उठ सकते हैं।

- खलील जिब्रान

पिछले दिनों अखबार में एक खबर छपी कि, मृत भाई की नौकरी पाने को भाभी व भतीजों की हत्या। यह घटना पश्चिम बंगाल के कलिम्पांग जिले के जलढाका थाना क्षेत्र में स्थित एक चाय बागान की है। भाई की मृत्यु के बाद छोटा भाई उसकी जगह नौकरी पाना चाहता था। परंतु भाभी अपने दो बच्चों की खातिर खुद ही प्रबंधन द्वारा आश्वासित अनुकंपा नियुक्ति चाहती थी। इस पर दोनों में विवाद था और उसकी परिणति अंतत: एक पक्ष की हत्या और दूसरे को जेल जाने में हुई।

प्रथम दृष्टया यह मामला सीधा-सीधा सा आपसी विवाद और व्यक्तिगत स्वार्थ का ही दिखाई देता है। एक हद तक इसे नकारा भी नहीं जा सकता। परंतु ऐसी स्थितियां एकाएक नहीं बन जातीं जिसमें कि कोई व्यक्ति इस तरह की नृशंसता पर उतर आए। यह घटना हमें जतला रही है कि भारत में बेरोजगारी और व्यक्तिगत असुरक्षा किस सीमा तक पहुंच चुकी है।  प्रधानमंत्री भले ही मखौल उड़ाने के अंदाज में पकौड़े बनाकर बेरोजगारी दूर करने को एक समाधान बताएं। शासक दल के अध्यक्ष संसद में उनकी बात को सत्यापित करने पर उतारू रहें, लेकिन फिर भी वास्तविकता यह है बढ़ती बेरोजगारी और सामाजिक असुरक्षा मनुष्य को पशु में परिवर्तित कर रही है और इस सिद्धान्त को अपनाने पर मजबूर कर रही है कि बलवान ही जिन्दा रह सकता है या दूसरे को मारकर ही खुद को जिन्दा रखा जा सकता है।

इधर इंदौर में छोटे भाई ने बड़े भाई की इसलिए हत्या कर दी क्योंकि बड़ा भाई मां की पेंशन उसे नहीं दे रहा था। यह तय है कि शासक समुदाय इसे अपनी अक्षमता नहीं मानेगा जैसे कि वह भूख से हुई मृत्यु को नहीं स्वीकारता और कहता है कि मौत तो अंगों के काम न करने से हुई है। अंगों ने काम करना क्यों बंद कर दिया इसे चर्चा का विषय नहीं बनाया जाए।

शासन किसी भी राजनीतिक दल का हो, वह अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता ही नहीं। वर्तमान सरकार इस वायदे के साथ सत्तारूढ़ हुई थी कि वह प्रतिवर्ष 1 करोड़ नौकरियां (स्वरोजगार नहीं) सृजित करेगी। परंतु ऐसा नहीं हुआ और इसकी महज 1.5 प्रतिशत नौकरियां ही उपलब्ध हो पाईं। मुद्रा योजना से स्वरोजगार की स्थिति भी हमारे सामने है। इस पर स्मार्ट सिटी या सड़क चौड़ीकरण या सौंदर्यीकरण या औद्योगिक विकास जैसे कारण बताकर लाखों 'पकौड़ा बेचने वालों'  को बेरोजगार बना दिया गया। पकौड़ा व्यापक तौर पर उन तमाम पटरी व ठेले पर व्यवसाय करने वालों का प्रतीक बन गया है जो कि आज सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर न केवल अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं बल्कि परिवार भी पाल रहे हैं।

 
अजीब परिस्थिति है कि कोई बेरोजगारी और आर्थिक शोषण पर गंभीर चर्चा ही नहीं करना चाहता। जाहिर है भारतीय शासनतंत्र का मुंह इतने मीठे पकवानों से भरा है कि दिमाग संज्ञाशून्य हो गया है और हाथों को तो सोना बटोरने से ही फुरसत नहीं है। तो वे क्या सोंचे और क्या करें? उनकी समझ में ही नहीं आ रहा है। प्रधानमंत्री विदेशी निवेश के सहारे देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं और वित्त मंत्री यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि उनकी आम बजट आर्थिक दस्तावेज है, सामाजिक दस्तावेज है, राजनीतिक दस्तावेज है या महज कागजों का पुलिंदा! अपवाद छोड़ दें तो हर राजनीतिज्ञ अपने दल को बचाने में लगा है, राष्ट्र को बचाने की चिंता किसी को भी नहीं है। शेयर बाजार का धड़ाम से गिरना और गैस भरे गुब्बारे की तरह उछलना अखबारों की सुर्खियां बटोरता है, परंतु कलिम्पांग या अन्य कहीं व्यक्ति का बेरोजगारी से निपटने के लिए मारना या मर जाना अब सुर्खियों का नहीं, अखबार के अंदर के किसी पन्ने पर एक कालम की छोटी सी खबर बन कर रह जाता है।

ब्रेख्त लिखते हैं, 'और मैं सोचता हूं बहुत सरल शब्द पर्याप्त होंगे/जब मैं कहूं चीजें कैसी हैं/ सबके चिथड़े-चिथड़े हो उठे हों/' त्रासदी यह है कि किसी तरह का विमर्श मात्र इन शब्दों में उलझ जाता है कि 'पिछले 55 वर्षों तक आपने शासन किया है या पहले भी तो ऐसा होता था।' यानी सत्ता परिवर्तन अर्थहीन हो गया है? हमारी सबसे बड़ी समस्या शायद यही है कि शासनतंत्र यह मानने को तैयार ही नहीं है कि भारत गांवों का देश है और जब तक वहां रोजगार नहीं बढ़ेंगे, देश की सूरत नहीं बदल सकती। पुरानी त्रिमूर्ति मनमोहन, मोंटेकसिंह और चिदंबरम के सपनों के भारत में 85 प्रतिशत लोग शहरों के निवासी होने की कल्पना थी तो यह नई त्रिमूर्ति नरेन्द्र मोदी, अरुण जेटली और अमित शाह का भारत संभवत: 95 प्रतिशत शहरी आबादी वाला होना चाहिए। इसके बाद भी हमारी या देश के बच रहने (आर्थिक रूप से) की कोई संभावना क्या बची रहती है? क्रूरता हर तरफ साफ दिखाई पड़ रही है।

गांवों से पलायन और शहरों में नाटकीय जीवन भरे मुंह और सोने से अटे हाथों के स्वामियों की दिखाई ही नहीं पड़ रहा है। वहीं गांधीजी ने कहा है, 'मेरे सपने का स्वराज्य तो गरीबों का स्वराज्य होगा। जीवन की जिन आवश्यकताओं का उपभोग राजा और अमीर लोग करते हैं; वही गरीबों को भी सुलभ होना चाहिए।' वे यह भी कहते थे कि, 'मेरी दृढ़ मान्यता है कि अगर भारत को सच्ची आजादी प्राप्त करना है और भारत के जरिये संसार को भी, तो आगे या पीछे, हमें यह समझना होगा कि लोगों को गांवों में ही रहना है, शहरों में नहीं, झोपड़ियों में रहना है महलों में नहीं। करोड़ों लोग शहरों ये महलों में कभी एक-दूसरे के साथ नहीं रह सकते। उस परिस्थिति में उनके पास सिवा इसके और कोई चारा नहीं होगा कि वे हिंसा और असत्य दोनों का सहारा लें।'  पिछले करीब 15 वर्षों में त्रिमूर्तियों के उपरोक्त दोनों समूह एक रोजगारविहीन अर्थव्यवस्था के संवाहक बने हैं। एक थोड़ा कम दूसरा थोड़ा ज्यादा।

वर्तमान शासन प्रणाली का नवाचार यह है कि यह कमोबेश संवेदनाशून्य बनता जा रहा है। पकौड़े बेचना न तो कोई खराब व्यवसाय है और न ही तुच्छ। परंतु यदि सरकारें अपने वायदों को पूरा करने में असफल रहती हैं और विषमता को परिहास में परिवर्तित करती हैं तो यह अक्षम्य है। चलिए हम मान लेते हैं कि भारत के 12 प्रतिशत बेरोजगार पकौड़़े का ठेला लगा लेते हैं और बाकी 88 प्रतिशत पकौड़े खाकर उनको व्यवसाय देते हैं। परंतु विवशता यह है कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बावजूद आज भी हॉकर्स और पटरी पर व्यवसाय करने वालों के पास कोई अधिकार नहीं है। प्रत्येक हॉकर आज रिश्वत देता है तभी व्यवसाय कर पाता है और उस पर भी यह डर हमेशा बना रहता है कि उसे कब बेदखल कर दिया जाएगा।

सरकार किसी को भी न तो आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर पा रही है और न ही सामाजिक सुरक्षा। राजनीति तो वंचितों, गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों की पहुंच से बाहर कर ही दी गई है। इनके दिल चिथड़े-चिथड़े हो रहे हैं और वे लगातार अपमानित महसूस कर रहे हैं। कलिम्पांग  या इंदौर की घटनाओं के पीछे की परिस्थितियों को समझे बिना टिप्पणी करना घातक होगा। बेरोजगार व्यक्ति के पास नैतिकता की गुंजाइश लगातार कम होती जाती है क्योंकि वह अपनी गरिमा के साथ लगातार समझौता कर रहा होता है। धीरे-धीरे भावशून्यता उसमें घर करती जाती है और वह कोई भी कीमत चुका कर जिंदा रहना चाहता है। 

ऐसे में कई बार इसकी परिणति कलिम्पांग के सूर्य भूजेल की तरह होती है। सूर्य अस्त हो जाता है और अंधकार चारों ओर घिर आता है। इस अंधकार के पार अभी कोई रोशनी भी नजर नहीं आ रही है। खलील जिब्रान ने कहा है,'शासन तुम्हारे और मेरे बीच का एक समझौता है, पर तुम और मैं प्राय: ही ठीक नहीं होते।' क्या इसकी व्याख्या कुछ इस तरह हो सकती है, कि शासन, शासन करने में सक्षम नहीं होता और हम उस असक्षम शासन को उखाड़ फेंकने में डरते हैं? वैसे गांधी जी कहते थे, 'भूखों मरता आदमी अन्य बातों से पहले अपनी भूख बुझाने का विचार करता है। वह रोटी का एक टुकड़ा पाने के लिए अपनी स्वतंत्रता और अपना सब कुछ बेच डालेगा।Ó भारत में 40 प्रतिशत लोग आज भी भूखे सोते हैं।
 

Source:Agency