अब बन ही जाइए इंटरनेट साक्षर

By Jagatvisio :30-03-2018 08:05


अभी फेसबुक से डाटा चोरी का विवाद ठंडा भी नहीं हुआ था कि एक नया विवाद खड़ा हो गया है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मोबाइल एप्लीकेशन पर। कांग्रेस का कहना है कि पीएम मोदी का मोबाइल एप्लीकेशन डाटा चुराता है। इसके बदले में भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगा दिये हैं कि वो डाटा चुराकर सिंगापुर भेजते हैं। मोदी के एप्लीकेशन को पचास लाख से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं।
आंकड़ों की कीमत यह है कि इनका किसी भी मार्केटिंग रणनीति तय करने में खासा अहम रोल होता है। अगर आपके पास अपने ग्राहकों या संभावित ग्राहकों की सटीक सूची है, उनकी रुचियों, नापसंदगियों के आंकड़े, जानकारियां हैं तो मार्केटिंग रणनीति बनाना आसान हो जाता है। राजनीति में अब राजनीतिक मार्केटिंग बहुत ही लोकप्रिय हो रही है। अब वोटर को किसी भी तरह से साधे रखना जरूरी हो गया है।
तथ्य चाहे जो हों, कथ्य अब सोशल मीडिया-ट्विटर, फेसबुक पर ही बन रहे हैं। ये ही आगे जा रहे हैं। मुख्यधारा का मीडिया भी इन्हीं के आधार पर अपनी रिपोर्टिंग कर रहा है, लेख प्रस्तुत कर रहा है। यानी कुल मिलाकर आंकड़े बहुत जरूरी हो गये हैं। उनका विश्लेषण करके उचित रणनीतियां बनायी जाती हैं। आंकड़ों के अध्ययन के लिए एक अलग शास्त्र विकसित हो गया है-डाटा एनालिटिक्स। आंकड़े तरह-तरह से जुटाये जाते हैं, फिर उनका प्रयोग तरह-तरह से किया जाता है। जैसे किसी व्यक्ति की फेसबुक वाल देखकर उसकी पसंदगी-नापसंदगी का अनुमान लगाया जा सकता है। उसकी पसंद के अनुकूल विज्ञापन संदेश देकर उसे अपने पक्ष में किया जा सकता है। जैसे किसी की फेसबुक वाल पर यह साफ होता है कि वह राम मंदिर का गहरा समर्थक है तो कोई राजनीतिक पार्टी उसे राम मंदिर से जुड़े वादों पर फोकस करके, राम सेतु पर फोकस करके अपनी तरफ करने की कोशिश कर सकती है। वह उसे ऐसे संदेश भेज सकती है ईमेल के जरिये, फेसबुक वाल पर कि वह उन संदेशों को पढ़कर उस पार्टी की ओर आकर्षित हो सकता है।
ऐसे ही अगर किसी की फेसबुक वाल से यह पता चलता है कि वह मोदी का विरोधी है तो उसे मोदी विरोधी संदेश देकर उसका रुझान धीरे-धीरे किसी मोदी विरोधी पार्टी की तरफ किया जा सकता है। यानी एक रणनीति के तहत व्यक्ति की पसंद और नापसंद का अनुवाद वोटों में किया जा सकता है। इसके लिए लगातार काम करना होता है। अमेरिका में ट्रंप की जीत के पीछे इस तरह का काम और इस तरह की तैयारी रही है। कौन आपकी प्रोफाइल छुप-छुप कर देखता है और उसका क्या उपयोग-दुरुपयोग हो सकता है, ये न तो उसे इस्तेमाल करने वाले ने सोचा होगा और न ही खुद फेसबुक ने कि इसकी वजह से वो समस्या में आ जायेंगे।
हाल ही में फेसबुक पर ये आरोप लगा है कि उसने फेसबुक यूजर्स की व्यक्तिगत जानकारियों का डेटा बाज़ार में बेचा है। केंब्रिज एनालिटिका नामक एक सोशल मीडिया मॉनीटरिंग एजेंसी ने एक फ़ेसबुक एप का प्रयोग करते हुए करीब पांच करोड़ फ़ेसबुक प्रयोक्ताओं का डाटा हासिल कर लिया और इस डेटा का इस्तेमाल अमेरिकी चुनाव में किया गया।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद फेसबुक को हर तरफ घाटा उठाना पड़ रहा है। जहां एक तरफ ट्विटर पर हैशटैग चल रहा है वहीं दूसरी ओर यह रिपोर्ट आने के बाद फेसबुक के शेयर बुरी तरह टूटे। इसी के साथ मोज़िला जैसे बड़े नामों ने भी फेसबुक के विज्ञापन बंद कर दिए हैं। इस मामले पर फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने माफ़ी मांगी और साथ ही एक पोस्ट के जरिए बताया कि भविष्य में डेटा लीक की इस तरह की समस्या से बचने के लिए फेसबुक में बदलाव किए जाएंगे।
डिजिटल होने के मामले में हम अभी भी समय से काफी पीछे हैं। इंटरनेट प्रदाता कंपनियों ने इंटरनेट काफी सस्ता कर रखा है। सोशल मीडिया पर प्राइवेसी क्या है या किसी से अपने बारे में कितनी जानकारी शेयर करनी है, इसकी मूलभूत जानकारी भी कम ही लोगों को है। किसी भी एप्लीकेशन को डाउनलोड किया जाये तो वह कई परमिशन मांगती है। जी मेल में अपना खाता खोलने के लिए गूगल तमाम शर्तों को सामने रखता है। पर अधिकांश लोग उन शर्तों को पढ़े बगैर ही एग्री कर देते हैं। बाद में उन इजाजतों से हासिल डाटा का विश्लेषण करके अगर कोई कंपनी रणनीति बनाती है, यह कानूनन तौर पर गलत नहीं है।
जरूरी यह है कि इंटरनेट प्रयोक्ताओं में, सोशल मीडिया प्रयोक्ताओं में यह ज्ञान विकसित किया जाये कि तमाम तरह की इजाजतों का मतलब क्या है। हमें एक बात समझ लेनी चाहिए कि मुफ्त कुछ भी नहीं है। हम किसी आइटम की कीमत नहीं दे रहे हैं, हम खुद कीमत बन रहे हैं। यानी हमसे जुड़ी जानकारियां आगे बेच दी जायेंगी। डिजिटल इंडिया बनाने में लगी भारत सरकार को इंटरनेट साक्षरता के लिए भी कुछ करना चाहिए। वरना इस तरह के आऱोप बार-बार लगेंगे कि उस डाटा का दुरुपयोग हो रहा है।
 

Source:Agency