दाल के जाल में बेहाल किसान

By Jagatvisio :04-04-2018 08:10


दाल की नई फसल अब तैयार हो गई है। किसान अपनी नई अरहर और चना बेच कर अगली फसल की तैयारी करना चाहते हैं, लेकिन सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य तक उन्हें नहीं मिल रहा।  जबकि रिकार्ड उत्पादन होने के बावजूद सरकार वर्मा सहित अन्य देशों से लगातार दाल का आयात कर रही है। दाल का उत्पादन देश में बढ़ने के बावजूद दाल के कारोबार में उसकी पहली कड़ी किसान और आखिरी सिरा यानी उपभोक्ता के हाथ में हाथ मलने के सिवा कुछ है ही नहीं।  आखिर यह सूरत बदलेगी कैसे?

दोसाल पहले वर्ष 2016 को अंतरराष्ट्रीय दाल वर्ष के रूप में मनाया गया था, तब देश में दाल की कीमत 200 रुपये प्रति किलोग्राम को पार कर गई थी, बावजूद इसके दाल उत्पादक किसानों को उनकी फसल का सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिला था। तब दाल की मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने देश कई अन्य देशों से भारी मात्रा में आयात की थी और पुन: ऐसी स्थिति न आए इसके लिए लंबे-चौड़े वादे और घोषणाएं की गई थीं। लेकिन दो साल बीतते-बीतते हम फिर उसी मुहाने पर खड़े हैं। महाराष्ट्र के दाल उत्पादक किसानों की दिक्कत है कि उनकी अरहर की कीमत प्रति किलोग्राम 40 रुपये भी नहीं मिल पा रही है, जब कि सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य 54 रुपये प्रति किलोग्राम निर्धारित की गई है। वहीं हाल चने का भी है। 

उल्लेखनीय है कि हमारे किसान दुनिया भर में सबसे ज्यादा दाल उपजाते हैं इसलिए यह देश और दाल उपजाने वाले हमारे किसानों के लिए खुशी का मौका होना चाहिये। पर जाने क्यों वे इससे जरा भी खुश नहीं दिखते। उपभोक्ता उम्मीद से है कि दाल सस्ती होगी। खुदरा दुकानदार ज्यादा दाल बेच बेहतर मुनाफे की आस में हैं तो बड़े व्यापारी नये स्टॉक को कब्जाने को लेकर उत्साहित हैं। सरकार को इस बात की राहत है कि इस मसले पर वर्ष 2016 में हुई उसकी खिंचाई खत्म हो गई है। यानि दाल से जिसका जरा भी वास्ता है वह कहीं न कहीं कोई उम्मीद और आस पाले हुए है। पर चाहे समूचे संसार में दो वर्ष पूर्व दाल वर्ष मनाए जाने की बात हो या अपने देश में दाल की नई फसल आने, उसके सस्ती होने की संभावना हो या फिर उसके दाम आसमान के पार पहुंच जाने की आशंका, किसान इन सबसे अछूता और हर हाल में नुकसान भुगतने को अभिशप्त है।

देश में दाल जब ठीक-ठाक उपजती है तो बाजार में ज्यादा दाल की आवक से भाव गिर जाते हैं। ज्यादा उपजाने का इनाम किसानों को घाटे के रूप में मिल रहा है। उधर सरकार निर्यात पर रोक लगा देती है, और आयात को अनुमति देती है। मतलब अगर किसान विदेशी बाजार में थोड़े महंगे दाम पर दाल बेच कर कुछ कमाई करना चाहे तो वह भी नहीं कर सकता। दाल की उपज कम हो जाए तो जाहिर है मांग के मुकाबले पूर्ति न होने से दाम बढें़गे, ऐसे में पहले तो बड़े व्यापारी इसका फायदा उठाते हैं, जमाखोरी होती है। महंगाई बढ़ती है तो सरकार दूसरे देशों से दाल खरीद लेती है। हम कनाडा जैसे बड़े देशों के अलावा रंगून, तंजानिया, मोजाम्बिक, मलावी, सूडान, केन्या और वर्मा तक से दाल खरीदते हैं। इसके चलते देसी दाल के दाम जमीन पर आ जाते हैं। किसानों को यहां भी नुकसान ही है। अरहर की दाल के दाम 120 रुपए किलो आ गए तो बहुतों ने सोचा किसान खुश होगा उसे ऊंचे दाम मिल रहे होंगे। लेकिन किसान के हाथ खाली है।

दाल उपजाने वाला किसान चौतरफा मार झेलने को मजबूर है। सरकार और उसके नीति-निर्धारकों को यह बात समझ में ही नहीं आ रही कि हालात ऐसे ही बने रहे तो किसान इसकी खेती की तरफ से मुंह मोड़ लेगा और उत्पादन घट जायेगा, समस्या निरंतर बनी ही नहीं रहेगी बल्कि बद से बदतर होती जायेगी। 2013-14 में देश में दलहन उत्पादन एक करोड़ 97 लाख 80 हजार टन हुआ था, जिसके 2014-15 में घटकर एक करोड़ 84 लाख 30 हजार टन रह गया। 2015-16 में फिर दाल के उत्पादन में थोड़ी बढ़ोतरी हुई, जो चालू वर्ष में भी जारी रहा। सरकारी नीति और मौसम की मार के चलते आने वाले वर्ष में इसके एक करोड़ 72 लाख टन से भी कम रह जाने की आशंका है।  इसमें जो दाल सबसे ज्यादा लोकप्रिय है यानी अरहर की दाल, उसका उत्पादन 31 लाख 70 हजार टन से घट कर 27 लाख 80 हजार टन हो गई। दालों की मांग पूरी करने के लिए वर्ष 2014-15 में अब तक कुल 85 लाख 84 हजार 84 टन दाल-दलहन का आयात किया जा चुका है। अभी भारी मात्रा में होना बाकी है।

 महाराष्ट्र जिसकी कुल पैदा होने वाली खरीफ दाल में लगभग चौथाई की हिस्सेदारी है, सूखा की मार झेलते रहने को अभिशप्त है। कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश इन चार सूबों के किसान मिलकर महाराष्ट्र के मुकाबले तकरीबन दूना दाल उपजाते हैं। देश में 87 प्रतिशत दलहन किसान आसमानी वर्षा पर निर्भर हैं जबकि इस बार यह सब कम बारिश की चपेट में हैं सो देश की लगभग 75 फीसद दाल जहां से आती है, उनका उत्पादन घटना तय है। विदेशी विक्रेताओं के लिए भारत एक बेहतर बाजार बन गया है। सरकार द्वारा विदेशों से दाल आयात किये जाने से अपनी भरपूर मेहनत और दाम लगाने के बाद दाल उपजाने वाले किसान को सिर्फ नुकसान उठाना पड़ रहा है।  न कोई सरकारी सहायता न दाल का बढ़ा हुआ समर्थन मूल्य, बस निराशा।

देश में किसान को एक किलो दाल के दाम सरकारी, गैर-सरकारी खरीद से औसतन 44 से 64 रुपये मिलते हैं।  खेती की लागत 40 से 54रुपये के बीच और बिक्री वाली जगह पर ले जाने तथा अपनी मेहनत अलग से। पर यही दाल बाजार में 110 से 220 रुपये किलो बिकती है। खुद सरकार विदेश से देसी किसानों से जिस दाम में दाल खरीदती है उससे कहीं ज्यादा दाम विदेशी किसानों को चुकाती है। पर समस्या के किसी मुकम्मल हल के बारे में कुछ नहीं करती। दाल के दामों में चढ़त का असर दाल की खेती पर दिख रहा है। पिछले साल के मुकाबले रबी दाल की बुआई में दूनी हुई है। कृषि उत्पाद विपणन विशेषज्ञ जयदीप गुप्ता कहते हैं, खरीफ दाल में तेजा इस बात का आधार नहीं है कि रबी की दालें भी उछाल मारेंगी और इसका लाभ किसान को मिलेगा। पहली बात यह कि दाल के कारोबार में उसकी पहली कड़ी किसान और आखिरी सिरा यानी उपभोक्ता के हाथ में हाथ मलने के सिवा कुछ है ही नहीं।

दाल के मामले में सबसे बड़े नुकसान में किसान है फिर उपभोक्ता और खुदरा दुकानदार यहां तक कि सरकार भी कम नुकसान में नहीं है। फायदा तो सिर्फ बड़े व्यापारियों, बिचौलिए, जमाखोरों, स्टाकिस्ट और वायदा कारोबारियों की जेब में जाता है। जिनकी इस पूरी प्रक्रिया में मुनाफा काटने के अलावा कोई भूमिका नहीं है। किसान और उपभोक्ता, सरकार और यहां तक कि खुदरा दुकानदार तक की जवाबदेही तय है पर ये महज मुनाफा कमाकर अलग हो जाते हैं। पल्स एंड ग्रेन एसोशिएशन ऑफ इंडिया के एक, प्रतिनिधि नाम उजागर न करने की शर्त पर कहते हैं, 'इस व्यापार में टाटा, रिलायंस और वॉलमार्ट जैसी बड़ी कंपनियां $खरीदार बन गई हैं और वायदा कारोबार जो एक तरह का सट्टा है जिसे खुद सरकार ही इजाजत देती है तो फिर जमाखोरी तो बढ़नी ही है और जिसके चलते दाम बढ़ते हैं और न किसान को लाभ मिलता है न उपभोक्ता को न खुदरा दुकानदार को। दाम तो फिर भी नीचे आ जायेंगे पर किसान एक बार अरहर या इस तरह की दाल उपजाना छोड़ किसी और तरफ रुख कर लिए तो क्या होगा।'

तो ऐसा क्या हो कि देश में दाल उपजाने वाले और उसे खाने वाले दोनों राहत महसूस करें। सीधी सी बात है सरकार और उसका संबंधित मंत्रालय सचेत हो। यह जो भी हो रहा है उसका सीधा दोष सरकार पर है। सरकार की उदासीनता, अक्षमता और अकर्मण्यता की वजह से ही दाल की उपज घट रही है, उसका भंडारण, विपणन उचित तरीके से नहीं हो पा रहा और खेत से थाली तक से सफर में व्यवसाय के बड़े खिलाड़ी, जमाखोर, बिचौलिये इसमें घुसपैठ कर जा रहे हैं, किसान का हक मार ले रहे हैं। देश में दाल की खपत सालाना 2.7 करोड़ टन है।  2013 में 2.0 करोड़ टन दाल पैदा हुई। 2014 में यह उपज 1.7 करोड़ टन रह गई थी। एक तो खपत की तुलना में कम उत्पादन फिर उसका लगातार घटना। सरकार को बेखबर देख मुनाफाखोरों को दाल का भंडारण करके लाभ कमाने का अवसर मिल गया।

सट्टेबाजी अब फ्यूचर ट्रेडिंग यानी कानूनी तौर पर वायदा कारोबार कहलाती है। इस धंधे में देशी-विदेशी दोनों तरह के पूंजीपतियों की मिली भगत है। बड़ी-बड़ी कंपनियां खेतों से ही औने-पौने दाम पर पैदावार की खरीद करती हैं और सट्टेबाजी करके इनकी कीमतें बढ़ाती हैं। दाल की पैदावार में 12 फीसदी की कमी आई लेकिन दाल के दाम 70 फीसदी तक बढ़ गए। किसानों को इन बढ़ी कीमतों का दशांश भी नहीं मिलता। पिछले साल अरहर की दाल 100 रुपए किलो थी। सरकार सही समय पर कदम उठाती और अरहर का समर्थन मूल्य इससे ज्यादा कर देती तो न जमाखोरी का संकट उत्पन्न होता न किसान रोता।

सरकार ने किसानों को लाभ कैसे मिले इस पर तो नहीं बल्कि महंगाई रोकने पर कमेटी बनाई जिसने कहा, किसान को सस्ते लोन मिले, कोल्ड स्टोरेज बनें, जगह-जगह मंडियां हों। यह सब ठीक है पर न तो दाल का उत्पादन बढ़ेगा न इससे किसान को कोई खास राहत मिलेगी। समाधान है तो सीधा सा यह कि किसानों को उपज बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सरकार को एक प्रभावशाली कार्य योजना तैयार करनी चाहिये। 

Source:Agency