बिहार में लाचारी के पर्याय हुए नीतीश

By Jagatvisio :09-04-2018 07:44


 पहले प्रेक्षक कहते थे कि चतुर नरेन्द्र मोदी नीतीश को 2019 के लोकसभा चुनाव में भरपूर इस्तेमाल कर अपना निष्कंटक राज सुनिश्चित करने के बाद किनारे लगायेंगे, लेकिन अब लगता है कि मोदी पहले ही इसकी शुरुआत कर चुके हैं। तभी तो गत वर्ष सितम्बर में हुए केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में उन्होंने नीतीश के जदयू को पूछा तक नहीं, हालांकि उसने उसमें शामिल होने वाले अपने नेताओं के नाम तक तय कर लिये थे। उस वक्त भाजपा के राज्य के नेता अपनी खुशी छिपा नहीं पाये थे। उनका मानना था कि ऐसा करके मोदी ने यह संदेश दिया कि अब नीतीश नई भाजपा के साथ डील कर रहे हैं, जहां वे नहीं, कार्यकर्ता और पार्टी सर्वोपरि हैं।

जनता दल यूनाइटेड के सुप्रीमो और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गत वर्ष जुलाई में अपने उन दिनों के 'बड़े भाई' लालू यादव के समूचे परिवार के  'जिसके सदस्यों में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी शामिल थे' 'व्यापक भ्रष्टाचार' के बहाने उनके राष्ट्रीय जनता दल और साथ ही कांगे्रस से 'धर्मनिरपेक्ष' महागठबंधन तोड़ा और 'साम्प्रदायिक' भाजपा से दोबारा गलबहियां करने चले, तो उसके ऐन पहले तक प्रेक्षकों में आमराय थी कि उनके दोनों हाथों में लड्डू हैं-मतलब, रास्ता साफ और 'सारे विकल्प' खुले हुए। यही कारण था कि उन्होंने कहीं विश्वासघाती तो कहीं अवसरवादी बताये जा रहे अपने पाला बदलने के विरुद्ध अपनी पार्टी के शरद यादव व अली अनवर जैसे दिग्गज नेताओं की बगावत की कतई परवाह भी नहीं की थी। 

तब, उनके सोने के दिनों और रुपहली रातों के बीच शायद ही किसी को इल्म रहा हो कि  जो भाजपाई लड्डू वे इस विश्वास के साथ खा रहे हैं कि उनके लिए उसका स्वाद 'पुराना और जाना-पहचाना' है, वह जल्दी ही वर्जित फल में बदलकर न सिर्फ उनके मुंह का जायका खराब करने बल्कि राजनीतिक व प्रशासनिक सामर्थ्य का हनन भी करने लगेगा। इतना ही नहीं, दुश्वारियों के जंगल में ले जाकर ऐसी दलदली भूमि पर खड़ा कर देगा, जहां से पीछे लौटने की राहें तो पहले से ही बन्द होंगी, आगे जाने की सहूलियत भी नहीं होगी। एक ओर कुंआ होगा, दूसरी ओर खाई और बचाने के लिए सिर्फ मुख्यमंत्री पद होगा जबकि गंवाने के लिए अपनी राजनीति की सारी कमाई! 

यकीनन, अब ऐसे ही दुहू भांति उर दारुन दाहू वाले मोड़ पर आ खड़े हुए हैं। गत रामनवमी के बाद से राज्य के एक के बाद एक नौ जिलों में हुए दंगों में उन्होंने जो सबसे बड़ी चीज गंवाई है, वह है उनकी 'सुशासन बाबू' की छवि। साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार हुए लोगों का वह विश्वास भी उन्होंने खोया ही खोया है जो उनके साथ खासे गहरे तक जुड़ा हुआ था और 'अविश्वसनीय' भाजपा के पिछले लम्बे अरसे के साथ में भी टूटा या कलंकित नहीं हुआ था।  प्रसंगवश, 1989 में हुए भागलपुर के कुख्यात दंगे के बाद से बिहार दंगों या साम्प्रदायिक हिंसा के लिहाज से कमोबेश सुकून में था। वहां नीतीश की सरकार रही हो या लालू-राबड़ी की, सौहार्द बना रहा था। यहां तक कि 1990 में लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोके और 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद भी माहौल नहीं बिगड़ा था।

लेकिन इस बार दंगों की जैसी झड़ी लगी और उसमें जिस तरह नीतीश सरकार की घटक भाजपा के एक गुट की भूमिका सामने आयी  'जिसमें, और तो और, केन्द्रीयमंत्री अश्विनी कुमार चैबे के बेटे अर्जित शास्वत तक शामिल हैं'  और नीतीश ने जिस तरह उनसे निपटने में खुद को बेहद लाचार अनुभव किया  ' चाहे भाजपा और नरेन्द्र मोदी के अरदब में होने के कारण या यह सोचकर कि धर्मनिरपेक्ष व साम्प्रदायिक दोनों खेमों को एक साथ नाराज करने का रिस्क उठाना भारी पड़ सकता है'  वह अभूतपूर्व है। इस कारण और भी कि इस लाचारी ने उन्हें अपने गृह जिले नालंदा को भी हिंसा से नहीं बचाने दिया।

दरअस्ल, भागलपुर के दंगों में 'आगे-आगे' चलकर साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने वाले उपद्रवियों का नेतृत्व करने वाले अर्जित शास्वत नये तेजस्वी यादव बन गये 'दोनों की ही मूल पहचान नीतीश के सहयोगी दल के नेता के बेटे की है ' तो कहते हैं कि 'विकल्पहीन' नीतीश किंकर्तव्यविमूढ़-से हो गये। इस कारण अदालत से अग्रिम जमानत अर्जी खारिज और वारंट जारी होने के बाद भी अर्जित पटना की सड़कों पर जुलूस में शामिल होकर मीडिया को इंटरव्यू देते रहे और नीतीश की पुलिस उन्हें हाथ लगाने की हिम्मत नहीं कर पाई। अर्जित के पिता अश्विनी चौबे राज्य के दूसरे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के साथ खुलकर उनका बचाव करते नीतीश सरकार की भद पिटवाते रहे, सो अलग। इससे विपक्ष को 'सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का' जैसी कहावत याद दिलाने का मौका मिला और उसने कहा कि अर्जित की जेब में तो भारत सरकार भी है और नीतीश सरकार भी!

यह तब था जब नीतीश राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा को कतई बर्दाश्त न करने और कानून व्यवस्था को लेकर कोई समझौता न करने का ऐलान करते नहीं थक रहे थे। लेकिन जब तक वे अर्जित को गिरफ्तार करवाते, जितना भी नुकसान होना था, हो चुका था और डैमेजकंट्रोल की कोई गुंजाइश नहीं बची थी। वह आगे भी नहीं बचने वाली क्योंकि अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के युग से आगे निकल आयी नरेन्द्र मोदी व अमित शाह की भाजपा 22 मार्च को बिहार दिवस पर पटना के गांधी मैदान में उनके द्वारा 'हाथ जोड़कर' की गयी यह कातर प्रार्थना भी सुनने को तैयार नहीं कि न झगड़ा लगाने वालों के जाल में फंसे और न किसी को फंसाये। 

वह सुन भी कैसे सकती है, जब उसके 'महानायक' नरेन्द्र मोदी व चाणक्य जैसे या कि 'अप्रतिम रणनीतिकार' अमित शाह की जोड़ी ने राज्य के अपने कार्यकर्ताओं को यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि नीतीश के वे दिन हवा हो चुके, जब वे जरा-सी बात को लेकर भाजपा नेताओं को दिया गया भोज रद्द कर उन्हें अपमानित करने पर उतर आतेे थे। भाजपा के लिहाज से यह जताना जरूरी भी था, क्योंकि राज्य में जो हालात हैं, उनमें नीतीश को पीछे किये बिना वह 'तीसरी' होने का कलंक शायद ही धो सके। चूंकि आगे का रास्ता उसे नीतीश की पार्टी की संभावनाओं के पार जाकर ही तय करना है इसलिए वह नीतीश को 'अपने झुंड से बिछड़े बंदर' जैसा बना डालने में कुछ भी उठा नहीं रख रही। उसकी सुविधा यह है कि अब उसके पास उनसे बड़े बड़े राजनीतिक बाजीगर हंै। यहां याद किया जाना चाहिए कि गत फरवरी में राज्य के मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर में भाजपा मनोज बैठा की कार से कुचलकर नौ मासूम स्कूली बच्चों की मौत हो गयी थी तो भी भाजपा के राजनीतिक बाजीगरों ने उसके खिलाफ कार्रवाई में नीतीश को ऐसा ही लाचार बना रखा था। इतना ही नहीं, अपने नेता को अपना न मानने का 'करिश्माÓ भी कर दिखाया था।

इस लाचारी के चक्कर में फंसकर नीतीश कितने असक्त हो गये हैं, इसे समझने के लिए यह भी याद करना होगा कि भाजपा से दूसरे महारास से पहले नीतीश प्रधानमंत्री पद के विपक्ष के 'संभावित' प्रत्याशी थे यानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकल्प। तब वे इस 'संभावितÓ को 'अवश्यंभावी' में बदलने को इतने उतावले थे कि चाहते थे कि कांगे्रस राहुल की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर भी उन्हें तरजीह दे। यह और बात है कि ऐसा होना न संभव था और न हुआ। वे भाजपा के साथ थे तो भी बिहार के भाजपा नेताओं की तो उनकी निगाह में कोई हैसियत ही नहीं थी। एक वक्त वे नरेन्द्र मोदी तक को नहीं सटियाते थे, लेकिन अब ऐसे दुर्दिन हैं कि उन्हीं की दया पर निर्भर हैं। 

इस 'दया' की बाबत पहले प्रेक्षक कहते थे कि चतुर नरेन्द्र मोदी नीतीश को 2019 के लोकसभा चुनाव में भरपूर इस्तेमाल कर अपना निष्कंटक राज सुनिश्चित करने के बाद किनारे लगायेंगे, लेकिन अब लगता है कि मोदी पहले ही इसकी शुरुआत कर चुके हैं। तभी तो गत वर्ष सितम्बर में हुए केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में उन्होंने नीतीश के जदयू को पूछा तक नहीं, हालांकि उसने उसमें शामिल होने वाले अपने नेताओं के नाम तक तय कर लिये थे। उस वक्त भाजपा के राज्य के नेता अपनी खुशी छिपा नहीं पाये थे। उनका मानना था कि ऐसा करके मोदी ने यह संदेश दिया कि अब नीतीश नई भाजपा के साथ डील कर रहे हैं, जहां वे नहीं, कार्यकर्ता और पार्टी सर्वोपरि हैं।

अब जानकार कहते हैं कि बिहार में जो कुछ हो रहा है, वह 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी है। नीतीश इसमें भाजपा व राजद दोनों से पिछड़ रहे हंै क्योंकि अपनी दो बड़ी गलतियों की फांस में हैं। पहली और सबसे बड़ी बात यह कि बार-बार पाले बदलते हुए उन्होंने समझ लिया था कि राजनीतिक अवसरवाद की सुविधाएं उन्हें हमेशा मुफ्त मिला करेंगी, जबकि यह सम्भव ही नहीं था। इसीलिए पहले राजद ने उनसे कीमत वसूलनी चाही और उन्होंने वह नहीं चुकाई तो अब भाजपा वसूल रही है-खुल्लमखुल्ला। याद रखना चाहिए कि लालू ने भी नीतीश को गले लगाकर बड़ा नहीं किया छोटा भाई ही बनाया था। हां,  विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के दूसरे नम्बर पर आने के बाद भी 'कृपापूर्वक' मुख्यमंत्री बना दिया था। अब भाजपा की कृपा से वे लालू के जेल में और उनके पूरे परिवार के भ्रष्टाचार के शिकंजे में फंसे होने के बावजूद राज्य की अररिया लोकसभा व दो विधानसभा सीटों के उपचुनाव में राजद का विजय रथ नहीं रोक पाये। कारण यह कि उनका शराबबंदी का नशा भी, कहते हैं कि राज्य के दलितों-पिछड़ों, अल्पसंख्यकों व गरीबों पर भारी पड़ रहा है और वे उनसे बुरी तरह नाराज हैं।

नीतीश ने दूसरी गलती पहले राजद और अब भाजपा जैसे 'दुश्मनों' को दोस्त बनाते वक्त अपेक्षित सतर्कता न बरत कर की। इसीलिए सांप छदूदर की गति को प्राप्त हो गये हैं और उनकी भविष्य की राजनीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं, जबकि दूर की सोच रही भाजपा उनके कहने से न कानून का सम्मान करने को तैयार है, न गठबंधन धर्म का पालन करने को। प्रेक्षकों की मानें तो गुजरात के वक्त से ही वह साम्प्रदायिक हिंसा व दंगों का लाभ उठाने में सिद्धहस्त है, जबकि दूसरी पार्टियां इस खेल में उसकी जितनी पारंगत नहीं हैं। नीतीश की पार्टी भी नहीं। सो, भाजपा आगे उसका क्या हाल करती है, देखना दिलचस्प होगा। 
 

Source:Agency