कर्नाटक है या कौरव सभा

By Jagatvisio :07-05-2018 05:54


चुनावों के कारण कर्नाटक में माहौल इस वक्त कौरवों की सभा में चल रही द्यूत क्रीड़ा जैसा हो गया है। जिसमें किसी भी तरह जीतना ही एकमात्र लक्ष्य है। फिर चाहे उसके लिए सारी मर्यादाओं को ताक पर क्यों न रख दिया जाए। कौरव सभा में भीष्म पितामह से लेकर तमाम बड़े-बुजुर्ग, गुरुजन बैठे रहे उनके सामने सभी तरह के अनाचार हो गए, लेकिन किसी ने कोई दखल नहीं दिया। सब चुपचाप बैठे तमाशा देखते रहे। कर्नाटक के चुनाव में भी राजनीति का जुआ पूरी बेशर्मी के साथ खेला जा रहा है, लेकिन चुनाव आयोग भीष्म पितामह या धृतराष्ट्र की तरह बेबस सा बैठा हुआ है।

चुनावी सभाओं में खुलेआम लोकतांत्रिक मर्यादाओं का चीरहरण किया जा रहा है और उसे रोकने की कोई कोशिश नहींं हो रही। धर्म, जाति, समुदाय के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं और खुलेआम धमकी भी दी जा रही है। हाल ही में भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बी एस येदियुरप्पा ने बेलगावी की चुनावी रैली में भाजपा समर्थकों को उकसाया कि कोई वोट डालने नहींआ रहा है तो उसके घर जाकर हाथ-पैर बांधकर ले आओ और भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में वोट डलवाओ। क्या चुनाव आयोग भाजपा उम्मीदवार के इस कथन को गंभीरता से लेकर कोई कार्रवाई करेगा या जुमला समझ कर हवा में उड़ा देगा? देखने वाली बात यह भी है कि भाजपा नेतृत्व अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार के इस कथन पर क्या रुख अपनाती है?

भाजपा के एक और स्टार प्रचारक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने भी चुनावी रैली में विवादित बयान दिया। कर्नाटक के सिरसी में जनसभा को संबोधित करते हुए योगी ने कहा था कि यहां पर आज एक राष्ट्रवादी सरकार की जरूरत है, जो कि राज्य से जेहादी तत्वों को बाहर निकाल सके। योगी ने ये भी कहा था कि कर्नाटक में 23 बीजेपी कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या कर दी गई थी।

जिहाद जैसे शब्द का इस्तेमाल कर धार्मिक उन्माद भड़काने वाले योगी जिन 23 लोगों की हत्या की बात कर रहे हैं, उस सूची में अशोकपुजारी का नाम सबसे पहले है और उसने टीवी कैमरे के सामने बयान देकर खुद ही पुष्टि कर दी कि वह कभी मरा ही नहीं था। सवाल यह है कि इस तरह का झूठ फैलाकर भाजपा कौन से धर्म का शासन स्थापित करना चाहती है। दरअसल कर्नाटक चुनाव को भाजपा से ज्यादा अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया गया है। इसलिए पहले प्रधानमंत्री की 15 रैलियां होने वाली थींऔर अब उसे बढ़ाकर 21 कर दिया गया है। इन रैलियों में प्रधानमंत्री अपने पद की गरिमा को ताक पर रखते हुए खालिस भाजपाई बनकर कांग्रेस पर हमला बोलते हैं। कभी भ्रष्टाचार, कभी परिवारवाद तो कभी कांग्रेस मुक्त भारत का उनका सपना, मोदीजी के भाषणों में एक राज्य के लिए प्रधानमंत्री का विजन नहीं झलकता, केवल सब कुछ हड़पने की लालसा झलकती है। हाल की एक रैली में उन्होंने कहा कि 15 मई के बाद कांग्रेस पीपीपी बन जाएगी। 15 मई को नतीजे आने हैं और मोदीजी यह मानकर चल रहे हैं कि जीत भाजपा की ही होगी। इसलिए वे कांग्रेस का मखौल उड़ाते हुए कहते हैं कि कांग्रेस पंजाब, पुडुचेरी और परिवार तक सिमट कर रह जाएगी।

मोदीजी के भाषण वे खुद लिखते हैं या कोई और, यह नहीं मालूम, लेकिन जो भी लिखता है उसके मन में लोकतंत्र के लिए कोई सम्मान नहीं है, यह झलकता है। कांग्रेस को केवल एक परिवार तक सिमटा हुआ बताना, उन तमाम लोगों का अपमान है, जो अपनी मर्जी से किसी राजनीतिक दल के समर्थक, कार्यकर्ता या मतदाता बनते हैं। लोकतंत्र ही नहीं, देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को लेकर मोदीजी कितने गंभीर हैं, इस पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। और इस बार सवाल सुप्रीम कोर्ट ने उठाया है। 

दरअसल केेंद्र सरकार को कावेरी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर बताना था कि इसे सुलझाने के लिए उसने क्या-क्या कदम उठाए हैं। इस पर केंद्र सरकार का ढीठ बच्चे जैसा जवाब सर्वोच्च अदालत में पेश हुआ कि कावेरी नदी के जल बंटवारे से संबंधित विधेयक कैबिनेट के समक्ष रखा जा चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा के बाद फिलहाल कर्नाटक चुनाव में व्यस्त हैं, इस वजह से अभी तक विधेयक को मंजूरी नहीं मिल पाई है। जिस मुद्दे पर दक्षिण भारत बीते कई सालों से सुलग रहा है, उसे सुलझाने की जगह अगर प्रधानमंत्री की प्राथमिकता चुनाव जीतना रहेगा, तो फिर इस देश का भगवान ही मालिक है। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार के जवाब पर नाराजगी तो जताई है, लेकिन क्या इससे मोदीजी के रवैये में कोई बदलाव आएगा? क्या न्यायपालिका और चुनाव आयोग सब की मर्यादा कौरवसभा की तरह ताक पर रखी जाएगी? 
 

Source:Agency