ओह कर्नाटक तुम भी

By Jagatvisio :16-05-2018 08:34


ओह कर्नाटक तुम भी। यह ट्वीट किया है जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने। कर्नाटक में भी कांग्रेस अपनी सत्ता नहीं बचा पाई और इसी पर शेक्सपियर के नाटक जूलियस सीजर के प्रसिद्ध वाक्य ब्रूटस यू टू की तर्ज पर उमर अब्दुल्ला ने कर्नाटक की हार पर खेद व्यक्त किया है। और यही आज की राजनीति का सच है कि एक बार फिर कांग्रेस की हार चर्चा के केेंद्र में है। कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें भारत के नक्शे में केसरिया रंग छाया हुआ था, कुछ जगहों पर सफेद रंग था। यानी जिन राज्यों में कांग्रेस या अन्य क्षेत्रीय दलों की सत्ता है, उन्हें सफेद दिखाया गया और इसके साथ कैप्शन लिखा था, कि भारत को सफेद दाग से मुक्त करना है।

सत्ता का मोह और राजनीतिक संवेदनहीनता की यह पराकाष्ठा है। या यूं कहें जीतने की आदत की गंभीर बीमारी है। कर्नाटक में और इससे पहले तमाम विधानसभा चुनावों में यह बीमारी सारे लक्षणों के साथ नजर आई है। जिन राज्यों में पूर्ण बहुमत किसी एक दल को मिला, तो उसने वहां सत्ता बना ली। लेकिन जहां आधे-अधूरे की स्थिति बनी, वहां भाजपा ने बाजी अपने नाम करने में देर नहीं की। गोवा, मणिपुर इसके ताजा उदाहरण हैं। कर्नाटक में भी चुनाव परिणाम ऐसे ही आए हैं कि किसी भी दल को पूरा बहुमत हासिल नहीं हुआ है।

भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, और कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही। मोदी-शाह की जोड़ी चाहे तो शान से कह सकती है कि हमने कांग्रेस मुक्त भारत की ओर एक और कदम बढ़ा लिया। वैसे भी उनके प्रवक्ता सुबह से कह रहे हैं कि अब कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी नहीं रही। उनके ऐसा कहने में भले ही दंभ झलके, लेकिन यह दंभ उन्हें एक के बाद एक हासिल हो रही जीत के कारण ही मिला है। अब यह कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का वक्त है कि उसके पैरों तले जमीन क्यों खिसकती जा रही है। अब भी अगर उसने ईमाानदारी से विश्लेषण नहीं किया और मठाधीश वाले रवैये से उसके नेता बाहर नहीं निकले, तो कांग्रेस वाकई मु_ी भर समर्पित नेताओं, कार्यकर्ताओं तक सीमित रह जाएगी।

कई राज्यों की तरह इस बार भी हार का ठीकरा राहुल गांधी पर फोड़ा जाएगा। बेशक, वे कांग्रेस के अध्यक्ष हैं तो हार की जिम्मेदारी उन्हें ही उठानी पड़ेगी। लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से लेकर तमाम नेताओं को सोचना चाहिए कि आखिर वे एक-दूसरे की राह का रोड़ा बनकर आखिर भाजपा के लिए रास्ता क्यों साफ कर रहे हैं? दो बिल्लियों की लड़ाई वाली पुरानी कहानी को कांग्रेसियों को फिर से पढ़ना और समझना होगा। राज्य दर राज्य हारती कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी विश्लेषक यही बताते हैं कि उनके बड़े नेता, जो खुद को क्षत्रप से कम नहीं समझते हैं, अपने आगे किसी को निकलने नहीं देना चाहते। 

कर्नाटक चुनाव में बेशक कमान सिद्धारमैया के हाथ में थी और प्रचार का बड़ा जिम्मा राहुल गांधी पर था, लेकिन उन्हें बाकी नेताओं का वह समर्थन नहीं मिला। जिस तरह नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व पर पूरी भाजपा समर्पित होकर चलती है, वह समर्पण भाव कांग्रेस में कहीं नजर नहींआता। कांग्रेस के क्षत्रपों का अहंकार जितना बढ़ता गया, उसका जनाधार उतना सिमटता गया। कर्नाटक में भी कांग्रेस का जनाधार कम होने का पहला बड़ा कारण उसका अहंकार रहा और दूसरा मौके की नजाकत को न समझना या कहें अतिआत्मविश्वास का शिकार होना।

त्रिशंकु विधानसभा का अनुमान लगते ही कांग्रेस ने जेडीएस के साथ हाथ मिलाने का निर्णय लिया, लेकिन यही काम अगर वह पहले करती तो आज स्थिति दूसरी होती। कांग्रेस के सामने उत्तरप्रदेश का उदाहरण है, जहां सपा और बसपा ने गठबंधन किया और भाजपा को हरा दिया। 14 साल पहले भी तो जब कर्नाटक में कांग्रेस को 65 और जेडीएस को 58 सीटें मिली थीं, तो 79 सीटें हासिल करने वाली भाजपा की जगह उन दोनों ने मिलकर सरकार बनाई थी। तब कांग्रेस का नेतृत्व सोनिया गांधी के पास था। अब वे कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं, लेकिन उनके मार्गदर्शन की जरूरत बनी हुई है। 

Source:Agency