मोदी के गुणगानों की निरर्थक होड़ के बीच चार साल

By Jagatvisio :28-05-2018 08:04


ऐसा नहीं होता तो मोदी के गुणगानों की निरर्थक होड़ के बीच चार साल पुराना यह तथ्य उससे अनदेखा नहीं रह जाता कि सोलह मई, 2014 को जनादेश मिलने से लेकर 26 मई की शाम उनके 'भव्य' शपथग्रहण  'इस मीडिया के शब्दों में राजतिलक'  तक देश की प्रगतिशील चेतना व उससे जुड़े लोकतांत्रिक जीवनमूल्यों की हेठी का ऐसा नया इतिहास या कि रिकार्ड बना कि उसके आगे मोदी निर्मित दूसरे इतिहास सर्वथा फीके पड़ गये। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी को केवल इसलिए दस दिनों तक मोदी की प्रतीक्षा करनी पड़ी कि सवा अरब भारतवासियों का जनादेश भी उनको इतनी शक्ति नहीं दे सका कि वे इस बीच पड़ने वाले अशुभ मुहूर्तों व लग्नों से डरे बिना उस पर बैठने का साहस कर सकें।

अच्छे या बुरे हर प्रवाह के साथ बेबस होकर बहने और स्वतंत्रतापूर्व से चली आ रही अपनी प्रतिरोध की परम्परा को लजाने को अभिशप्त हिन्दी मीडिया का एक बड़े हिस्से को, जिसे अपने कर्तव्यनिर्वहन में वस्तुनिष्ठ होना कतई गवारा नहीं होता, अभी भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व उनकी सरकार के हर काम को ऐतिहासिक बताने की लत लगी हुई है। इसका एक कारण निश्चित ही यह भी है कि यह मीडिया इतिहास बनाने की अपनी शक्ति काफी पहले खो चुका है और अब इतिहास बताकर ही काम चलाने को अभिशप्त है। भले ही इस चक्कर में इतिहास व उसकी भूमिका दोनों बहुत सस्ती होकर रह जायें और कभी सचमुच का इतिहास बने तो वह दृष्टि से ओझल होकर रह जाये!

ऐसा नहीं होता तो मोदी के गुणगानों की निरर्थक होड़ के बीच चार साल पुराना यह तथ्य उससे अनदेखा नहीं रह जाता कि सोलह मई, 2014 को जनादेश मिलने से लेकर 26 मई की शाम उनके 'भव्य' शपथग्रहण  'इस मीडिया के शब्दों में राजतिलक'  तक देश की प्रगतिशील चेतना व उससे जुड़े लोकतांत्रिक जीवनमूल्यों की हेठी का ऐसा नया इतिहास या कि रिकार्ड बना कि उसके आगे मोदी निर्मित दूसरे इतिहास सर्वथा फीके पड़ गये। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी को केवल इसलिए दस दिनों तक मोदी की प्रतीक्षा करनी पड़ी कि सवा अरब भारतवासियों का जनादेश भी उनको इतनी शक्ति नहीं दे सका कि वे इस बीच पड़ने वाले अशुभ मुहूर्तों व लग्नों से डरे बिना उस पर बैठने का साहस कर सकें।

संत कबीर की 'करमगति टारे नाहिं टरी' वाली सीख की अनसुनी कर उन्होंने 26 मई, 2014 की शाम गोधूलि बेला, भरणी नक्षत्र व शिव प्रदोष में गुरु वशिष्ठ से ज्ञानी पंडितों के बताये लग्नानुसार शपथ ली, जब ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वैसा ही योग उपस्थित हुआ, जैसा होने पर चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य का राज्याभिषेक कराया था, ताकि उनका संसार खुशियों से भरा रहे। उस समय तुला लग्न थी और वृश्चिक राशि के नरेन्द्र मोदी इस अर्थ में भाग्यशाली थे कि उनकी राशि का स्वामी शुक्र चंद्रमा के साथ उसी समय सप्तम भाव में आ रहा था। इतना ही नहीं, लग्न में उच्चस्थ शनि पर गुरु और शुक्र की कृपा, चंद्रमा की पूर्ण दृष्टि और नवम भाव में भाग्येश के साथ गुरु की युति बहुत कुछ संदेश दे रहे थे।  

दरअस्ल, ज्योतिषियों के अनुसार 23 मई से मोदी की कुंडली में 18 वर्ष सात महीने और दो दिन के लिए शुक्र की महादशा शुरू हो गई थी और अष्टम भाव का सूर्य उनकी परेशानी का कारक था! वह तो गनीमत थी कि सौरमंडल के अन्य ग्रह मोदी के पक्ष में थे और उन्होंने उनपर सूर्य की 'कृपा' सुनिश्चित की! इस दृष्टि से देखें तो मोदी उन्हें मिले जनसमर्थन के लिए बेवजह ही देश की जनता के प्यार अथवा भाजपा कार्यकर्ताओं की मेहनत के शुक्रगुजार हुए जाते हैं! जो कुछ भी हुआ, उसमें अवश्य ही उनके मित्र व शत्रुग्रहों की भूमिका रही होगी।

अवश्य ही उन्होंने जनता की मति मोदी के पक्ष में फेर दी होगी! कौन जाने, चुनाव आयोग को भी उन्होंने ही ऐसे शुभ मुहूर्त में मतदान कराने के लिए प्रेरित किया हो ताकि मोदी के जीतने व प्रधानमंत्री बनने की राह निष्कंटक हो सके। इस कुतर्क प्रक्रिया को थोड़ा पीछे ले जायें तो मोदी के जन्म के समय ही तय हो गया होगा कि वे एक दिन भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे। तदनुसार वे बन गये तो इसमें उनका क्या योगदान है? फिर वे उसे लेकर इतनी असुरक्षा के शिकार क्यों हों कि शुभ मुहूर्त में शपथ लेकर उसकी उम्र लम्बी करना चाहें? अगर सब कुछ ग्रहों व नक्षत्रों का ही खेल है और सब कुछ उन्हीं के इंगित पर होना है तो जो होना होगा, होता ही जायेगा! उनके शपथ के दिन हुई उत्तर प्रदेश की वह भीषण रेल दुर्घटना ही कहां टली, जो पहले से होनी 'तय' थी? लेकिन चूंकि ज्योतिष हमारे परिवेश में व्याप्त अनिश्चितताओं को भुनाकर ही शास्त्र का दर्जा प्राप्त करता और लुभाता है, इसलिए कभी निर्णायक बात नहीं कहता।

कभी भाग्य को हाथों की लकीरों में ढुंढ़वाता है, कभी कहता है कि वह कर्म से बनता बिगड़ता है और कभी उसे शुभ व अशुभ मुहूर्तों के चक्कर में भटकाता है। जिसे कबीर करमगति कहते हैं और जिसकी बिना पर वशिष्ठ जैसे गुरु के लग्न शोधन की खिल्ली उड़ाते हैं, उसे भी वह भाग्यगति बनाने से नहीं चूकता! मोदी के शपथ ग्रहण के दिन रेल दुर्घटना हो गई तो एक स्वनामधन्य ज्योतिषी इन पंक्तियों के लेखक से कह रहे थे कि यह मोदी द्वारा वाराणसी से नामांकन के लिए अच्छे ज्योतिषियों की राय की उपेक्षाकर खराब मुहूर्त चुनने का नतीजा है और इससे आगे और अनर्थ होंगे! मुंडे का देहांत हुआ तो उन्होंने कहा कि मैंने तो पहले ही कह दिया था।

क्या अर्थ है इसका? यही कि प्रतिगामी ताकतों के चक्कर में आप जितने पीछे जायेंगे, वे उतना ही और पीछे ले जाना और हर कदम के लिए अपना मोहताज बनाना चाहेंगी। क्या मोदी इसके लिए तैयार हैं? इसका जवाब हां हो या ना, सवाल जस का तस रहेगा कि अगर नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना उनके भाग्य का लेखा है अथवा उनके शुभ व अशुभ ग्रहों, लग्नों व मुहूर्तों आदि का फल है तो इस मामले में मोदी या देश की जनता के करने के लिए क्या रह जाता है?

बेहतर हो कि तब शपथ का मुहूर्त तय करने वाले ज्योतिषियों से अब यह पूछा जाये कि उनके बताये मुहूर्त में जन्म लेने वाली मोदी सरकार महंगाई या भ्रष्टाचार के उन्मूलन के वायदे को निभाने में सफल क्यों नहीं हुई? हां, उनके द्वारा दस दिनों तक शुभ मुहूर्त की जो प्रतीक्षा कराई गई, वह इस अर्थ में नरेन्द्र मोदी के काम की रही कि मंत्रियों की सूची को लेकर उनके व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच परदे के पीछे चल रहा विचार-विमर्श शुभगति को प्राप्त हो गया! वैसे मोदी के अच्छे दिन ऐसे मुहूर्तों की प्रतीक्षा का नाम है तो वे आयें या नहीं, उसमें मोदी का कितना और कौन सा श्रेय है?

कई हलकों में तभी आशंका जताई गई थी कि इक्कीसवीं शताब्दी के चैदह सालों बाद वे देश का मुंह जिस पोंगापथ की ओर कर रहे हैं, उसके दल-दल में फंसने के बाद देश की मुक्ति और मुश्किल हो जायेगी! आज जिस तरह उनके मंत्री और मुख्यमंत्री एक के बाद एक लगातार अवैज्ञानिक टिप्पणियां करके इस संवैधानिक प्रावधान की सरासर अवज्ञा कर रहे हैं कि सरकारों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना होगा, उससे डर लगता है कि कल उनका कोई और सिपहसालार यह कहने को आगे न आ जाये कि इस देश का जन्म ही इतने खराब मुहूर्त में हुआ है कि इसको समस्याओं से निजात नहीं मिलने वाली!
 

Source:Agency