विदाई सालगिरह, एक्स्ट्रा धूम-धड़ाका!

By Jagatvisio :30-05-2018 08:24


वास्तव मेें, चौथी सालगिरह पर मोदी राज के लिए सबसे बड़ी बुरी खबर यही है कि उससे जनता का मोहभंग हो रहा है और बढ़ती तेजी से मोहभंग हो रहा है। सीएसडीएस-लोकनीति के हाल में आए प्रतिष्ठिïत सर्वे के नतीजों के अनुसार, न सिर्फ विधानसभाई चुनाव के अगले चक्र में राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में भाजपा का हारना तय है बल्कि अगर तुरंत चुनाव हो जाएं तो देश के पैमाने पर भी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को सिर्फ 37 फीसद मतदाताओं का समर्थन मिलने जा रहा है, जबकि उसके लिए मुख्य चुनौती बनने वाले कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूपीए को 31 फीसद मतदाताओं का।

मोदी सरकार की चौथी सालगिरह का जश्न सबसे लंबा चलने जा रहा है। मोदी सरकार को पिछली सालगिरहों के मुकाबले लंबे जश्न की वाकई जरूरत है। आखिरकार, अपनी चौथी सालगिरह पर मोदी सरकार चौतरफा संकटों से घिरी नजर आ रही है। यह तो खैर किसी से भी छुपा हुआ नहीं है कि मोदी सरकार को यह सालगिरह, कर्नाटक में किसी भी तरह से सरकार पर काबिज होने की भाजपा की कोशिशों की विफलता के साए में मनानी पड़ रही है। कर्नाटक के विधानसभाई चुनाव में, जो मोदी सरकार की चौथी सालगिरह की पूर्व-संध्या में हुआ एकमात्र महत्वपूर्ण चुनाव था, भाजपा-आरएसएस ने जीत हासिल करने के लिए धन बल से लेकर सांप्रदायिक छल तक, अपने तमाम हथकंडे ही नहीं आजमाए थे, उसने राज्य की जनता द्वारा चुनाव में बहुमत से दूर रखे जाने और मत फीसद में कुल 36.2 फीसद मतों के साथ दूसरे नंबर पर ही रह जाने के बाद भी, ''अपनी'' सरकार थोपने की हर मुमकिन कोशिश की थी। इसके लिए राज्यपाल के पद का दुरुपयोग कर, बहुमत के स्पष्टï रूप से जनता दल (सेकुलर)-कांग्रेस गठबंधन के साथ होने के बावजूद, भाजपा नेता येद्दियुरप्पा को मुख्यमंत्री के पद पर बैठाने से लेकर, विपक्षी विधायकों की खरीद-फरोख्त की कोशिशों तक, सारे हथकंडे बड़ी बेशर्मी के साथ आजमाए गए थे। 

बहरहाल, विपक्षी एकता के सामने और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप कर फौरन बहुमत का परीक्षण कराने का निर्देश देने के बाद, भाजपा-आरएसएस की ये सभी कोशिशें विफल हो गयीं और येद्दियुरप्पा को शपथ लेने के 53 घंटे के बाद ही इस्तीफा देना पड़ गया। यह नरेंद्र मोदी के विजय रथ के बाकायदा रोके जाने और पीछे धकेले जाने का मामला था। याद रहे कि इस विजय रथ का रास्ता रोके जाने की शुरूआत तो इससे पहले, मोदी के गृहराज्य तथा गढ़ माने जाने वाले, गुजरात से ही हो गयी थी, जहां विधासभाई चुनाव में भाजपा सौ का आंकड़ा नहीं छू पायी थी और पिछले चुनाव के मुकाबले उसकी सीटों में उल्लेखनीय कमी हुई थी। फिर भी, गुजरात में भाजपा अंतत: सरकार बनाने में तो कामयाब हो गयी थी।

लेकिन, कर्नाटक में सारी तिकड़मों के बावजूद, वह सरकार पर काबिज नहीं हो पायी। लेकिन, कर्नाटक के इस धक्के के अलावा भी दो-तीन बुरी खबरें मोदी सरकार के चार साल के जश्न को फीका कर रही हैं। इनमें पहली बुरी खबर तो पेट्रोल तथा डीजल के दाम में, लगातार जारी बढ़ोतरी की ही है। कर्नाटक के चुनाव तक, जाहिर है कि मोदी सरकार के इशारे पर, पूरे अठारह दिन तेल के दाम बढ़ाने को टालने के बाद से, तेल कंपनियों ने हर रोज तेल के दामों में बढ़ोतरी कर, पेट्रोल तथा डीजल के दामों को अपने अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया है। विडंबना यह है कि चौथी सालगिरह के रंग में भंग डालने वाली इन हर रोज हो रही बढ़ोतरियों को किसी तरह से फिलहाल टाले जाने की भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की 'उम्मीदों' के बावजूद, यह सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। बेशक, तेल की कीमतों पर इस समय दोहरा दबाव पड़ रहा है। एक  तो अंतर्राष्टï्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं, जिसका सीधा असर भारत में तेल की लागत पर पड़ता है क्योंकि वह आज भी अपनी जरूरत के 85 फीसद के करीब तेल का आयात करता है। इसके ऊपर से रुपया इस समय दबाव में है और उसकी विनिमय दर घट रही है। इसका नतीजा यह है कि अंतर्राष्टï्रीय बाजार में तेल की कीमत जहां की तहां रहे तब भी, रुपए में तेल का आयात मूल्य बढ़ ही रहा होगा। 

    यह दुहरा दबाव इसका ही इशारा करता है कि यह समस्या सिर्फ तात्कालिक नहीं है और अपने पांचवें साल में मोदी सरकार को काफी समय तक तेल संकट से जूझना पड़ सकता है। याद रहे कि तेल के दाम में बढ़ोतरी, सिर्फ तेल उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ने तक सीमित मामला नहीं है। तेल, एक सार्वभौम लागत सामग्री है और उसके दाम में बढ़ोतरी सीधे-सीधे आम तौर पर कीमतों को ऊपर धकेलने का काम करती है। अचरज की बात नहीं है कि मोदी सरकार की चौथी सालगिरह, मुद्रास्फीति की दर में बढ़ोतरी की भी पृष्ठïभूमि में मनायी जा रही है। समझना मुश्किल नहीं है कि  इसका चौथी सालगिरह के रंग पर क्या असर पड़ रहा होगा। 

लेकिन, मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि अंतर्राष्टï्रीय बाजार में तेल के दाम बढ़ने का बोझ जनता पर पड़ रहा है। इसी के साथ जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि इससे पहले तक, जब अंतर्राष्टï्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बहुत दबे हुए थे, तब भी भारतीय बाजार में पैट्रोल तथा डीजल के दाम अपेक्षाकृत ऊंचे ही बने रहे थे। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ था कि तेल के आयात बिल में हुई भारी कमी का सारा लाभ, आबकारी व अन्य महसूलों में लगातार बढ़ोतरी के जरिए, केंद्र सरकार द्वारा ही हथिआया जा रहा रहा था। इसी का नतीजा है कि आज हर एक लीटर पेट्रोल पर केंद्र सरकार आबकारी की मद में करीब 20 रु0 बटोर रही है और पेट्रोल के बाजार भाव में आधे से थोड़ा ही कम हिस्सा करों का होता है। इसी का नतीजा इस तरह की विडंबना के रूप में सामने आया है कि कच्चे तेल का दाम आज भी, 2014 में मोदी सरकार के सत्ता संभालने के समय के मुकाबले तीन-चौथाई ही है, इसके बावजूद पैट्रोल तथा डीजल के दाम बहुत ऊपर चढ़ चुके हैं। और यह भी कि भारत में पैट्रोल तथा डीजल के दाम, ज्यादातर पड़ोसी देशों के मुकाबले भी बहुत ज्यादा चल रहे हैं।

अचरज नहीं कि अपनी चौथी सालगिरह पर मोदी सरकार को इसकी सफाइयां देनी पड़ रही हैं कि क्यों वह तेलों से अपनी इस भारी कमाई को छोड़ने या कम करने के लिए तैयार नहीं है। अब जाहिर है कि मोदी सरकार से असली वजह बताने की उम्मीद तो कोई भी नहीं करेगा। असली वजह संक्षेप में यह है कि इस सरकार के लिए, जो कार्पोरेटों तथा अन्य धनी तबकों को कर रियायतों पर कर रियायतें देने में लगी रही है, तेल वह दुधारू गाय बन गया है, जिसकी कमाई से वह अपने राजस्व घाटे पर अंकुश लगाए रही है, जोकि अंतर्राष्टï्रीय वित्तीय पूंजी की एक प्रमुख मांग है। इस सचाई को छुपाने के लिए भाजपा गोयबल्सीय किस्म के झूठ प्रचार का सहारा ले रही है कि यह पैसा ढांचागत क्षेत्र और सामाजिक क्षेत्र में लगाया जा रहा है। यह स्वाभाविक रूप से विभिन्न स्तरों पर उसके झूठे प्रचार को चुनौती दिए जाने तक ले जा रहा है क्योंकि सभी प्रमुख सामाजिक क्षेत्रों में मोदी सरकार ने निवेश बढ़ाने के बजाए, उल्लेखनीय कटौतियां ही की हैं। ये कटौतियां विभिन्न सेवाओं में गरीबों को दी जाने वाली सब्सीडियों में भारी कटौतियों के ऊपर से हैं। और रोजगार के मोर्चे पर तो खैर मोदी सरकार की विफलता किसी से भी छुपी हुई नहीं है। इन कडुई सचाइयों को न तो झूठे प्रचार के अंधड़ से ज्यादा दिन तक छुपाया जा सकता है और न सांप्रदायिकता तथा अंधराष्टï्रवाद के चश्मे बांटकर। 

वास्तव मेें, चौथी सालगिरह पर मोदी राज के लिए सबसे बड़ी बुरी खबर यही है कि उससे जनता का मोहभंग हो रहा है और बढ़ती तेजी से मोहभंग हो रहा है। सीएसडीएस-लोकनीति के हाल में आए प्रतिष्ठिïत सर्वे के नतीजों के अनुसार, न सिर्फ विधानसभाई चुनाव के अगले चक्र में राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में भाजपा का हारना तय है बल्कि अगर तुरंत चुनाव हो जाएं तो देश के पैमाने पर भी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को सिर्फ 37 फीसद मतदाताओं का समर्थन मिलने जा रहा है, जबकि उसके लिए मुख्य चुनौती बनने वाले कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूपीए को 31 फीसद मतदाताओं का। गौर करने वाली बात यह है कि ठीक एक साल पहले, एनडीए के लिए यह समर्थन 45 फीसद था, जो इसी साल जनवरी तक घटकर 40 फीसद रह गया था। दूसरी ओर यूपीए के लिए समर्थन एक साल पहले 27 फीसद ही था, जो इसी साल जनवरी तक बढ़कर 30 फीसद पर पहुंच गया था। इस तरह, मोदी के नेतृत्व में एनडीए के समर्थन में यह गिरावट न सिर्फ जारी है बल्कि समय के साथ उसकी रफ्तार भी बढ़ रही है। यानी चौथी सालगिरह, आखिरी सालगिरह भी हो सकती है, जिसे मनाने का मोदी सरकार को मौका मिले। विदाई सालगिरह में कुछ फालतू धूम-धड़ाका तो बनता ही है!  
 

Source:Agency