किसानों का आंदोलन पूरे देश की निर्णायक लड़ाई है

By Jagatvisio :01-06-2018 09:08


भारत के किसान अपनी मांगों को लेकर लामबंद हो गए हैं और 1 से 10 जून तक देश भर में 'गांव बंद आंदोलन' का आयोजन कर रहे हैं। राष्ट्रीय किसान महासंघ के आह्वान पर भारत के लगभग 110 किसान संगठन इसमें शामिल होंगे। यह आंदोलन पूरी तरह से शांतिपूर्ण और गैर-राजनैतिक होगा। कृषि और किसानों की आजादी के बाद से ही सरकारों द्वारा की जा रही उपेक्षाओं के कारण देश के किसान अब 'करो या मरो;' की स्थिति में आ गए हैं। 1 से 10 जून तक गांवों से शहरों को होने वाले सभी तरह के खाद्यान्नों, सब्जियां, फलों और दूध की सप्लाई ये किसान नहीं करेंगे। इतना ही नहीं, इस अवधि में गांव के किसान शहर भी नहीं आएंगे। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष किसानों ने अनेक राज्यों में 1 से 10 जून को ही आंदोलन किया था। इस दौरान 6 जून को मंदसौर मध्यप्रदेश में पुलिस की फायरिंग से 6 किसान मारे गए थे। इस 6 जून को (आंदोलन के चलते में) उन किसानों को करीब 2000 स्थानों पर किसान अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि देंगे।

किसानों की 4 मांगें हैं, जिन्हें लेकर यह राष्ट्रव्यापी आंदोलन किया जा रहा है- संपूर्ण कर्ज मुक्ति, किसानों की सुनिश्चित आय, सी2+50 प्रतिशत के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य और सब्जी-दूध का भाव भी सी2+50 प्रतिशत फार्मूले के आधार पर तय हो। पूरे देश के किसान, उनसे जुड़े संगठन और विभिन्न संस्थाएं इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए जुट गई हैं। देश के इतिहास में यह पहला ऐसा आंदोलन होने जा रहा है जिसमें किसान अपनी स्थिति को सुधारने के लिए एक तरह से निर्णायक लड़ाई लड़ने जा रहे हैं। आंदोलनकारियों को शहरवासियों से भी पूरे समर्थन और मदद की उम्मीद है।
हरियाणा के युवा किसान नेता अभिमन्यु कोहाड़ इस आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। गांव-गांव के युवकों और किसानों को जोड़ने के अलावा आंदोलन से जुड़ी खबरें विभिन्न माध्यमों से जनता तक पहुंचाने की उनकी जिम्मेदारी है। टेलीफोन पर उनसे किसानों की बदहाल स्थिति, कृषि सेक्टर की दुर्दशा और आंदोलन को लेकर वरिष्ठ पत्रकार दीपक पाचपोर ने बात की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-

- इस आंदोलन को लेकर क्या तैयारियां हैं?

कोहाड़:- 1 से 10 जून तक देश भर के किसान अपना कोई भी उत्पादन (अनाज, फल, दूध, सब्जियां आदि) गांव से बाहर न भेजने के लिए कटिबद्ध हैं। डीजल की बढ़ी कीमत से त्रस्त होकर समराला (पंजाब) में करीब दो सौ किसानों ने अपने ट्रैक्टरों को सड़कों पर खड़ा कर दिया है और चाबियां प्रशासन को सौंप दी हैं। सिरसा (हरियाणा) में भी इसे लेकर बड़ी बैठक हुई है और देश भर में इसे सफल बनाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए गए हैं। ऐसे ही, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसान भी प्रभावशाली सत्याग्रह की तैयारियां कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, मप्र, कर्नाटक, केरल, जम्मू-कश्मीर आदि में इस गांवबंदी आंदोलन का व्यापक असर होगा।

- क्या यह किसानों द्वारा शहरों की नाकाबंदी है?

कोहाड़:- नहीं। शहरवासियों को किसी भी तरह की तकलीफ हम नहीं देना चाहते। हमें पता है कि शहरवासी हम पर अनेक मामलों में आश्रित हैं और हमारा भी गुजारा उनके बिना नहीं हो सकता। परस्पर संबंध और यह सौहार्द्र हम किसी भी कीमत पर समाप्त नहीं होने देंगे। हमने तय किया है कि अपने उत्पादों को शहर तो नहीं भेजेंगे लेकिन अगर शहरवासियों को अपने पारिवारिक या निजी इस्तेमाल के लिए किसी वस्तु की आवश्यकता है तो वे गांव आएं, जहां कुछ केन्द्र बनाए जाएंगे। यहां से वे सी2+50 प्रतिशत के एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर हमारी वस्तुएं खरीद सकते हैं। हमने यह भी तय किया है कि विरोधस्वरूप हम अपनी कोई भी वस्तु न फेकेंगे और न ही बर्बाद करेंगे। गरीब बस्तियों में और जरूरतमंदों को वे उत्पाद दे दिए जाएंगे जो जल्दी खराब हो जाते हैं। यह भी निश्चित है कि यह आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण और अहिंसक होगा। हमने अपने आंदोलनकारी किसानों को आगाह किया है कि आंदोलन को बदनाम करने या तोड़ने की नीयत से घुसने वाले शरारती तत्वों को निकाल बाहर करें और पुलिस को सांैप दें।

-देश के किसानों के सामने आखिर यह स्थिति कैसे आई कि उन्हें ऐसा सख्त कदम उठाना पड़ रहा है?

कोहाड़:- आजादी के बाद से किसान, कृषि और ग्राम सर्वाधिक उपेक्षित होते आए हैं। लाल बहादुर शास्त्री या चौधरी चरण सिंह जैसे एक-दो प्रधानमंत्रियों ने ही किसानों की स्थिति को सुधारने के लिए कुछ गंभीर कदम उठाए। परंतु दोनों के ही कार्यकाल इतने संक्षिप्त थे कि उनका कोई बहुत ज्यादा असर नहीं हो पाया। उनके महत्व को भी इन्हीं दो प्रधानमंत्रियों ने समझा था। शास्त्रीजी के आह्वान पर देश के अनाज भंडारों को किसानों ने अपनी मेहनत से भर दिया था। परंतु उनके बाद किसानों की स्थिति में सुधार के लिए किसी भी सरकार ने प्रभावशाली कदम नहीं उठाए। इस सेक्टर की घनघोर उपेक्षा की गई है जिसके कारण देश के किसानों की स्थिति ऐसी हो गई है कि उसका जीवित रहना भी मुश्किल हो गया है। उसके उत्पादों का उसे न तो उचित मूल्य मिल रहा है और न ही सरकारें (सभी तरह के) उनकी स्थिति को सुधारने के लिए इच्छुक दिखाई देती हैं। ऐसे में लगातार बढ़ती महंगाई, इनपुट की बढ़ती कीमतें, उचित मूल्य न मिलने से लगातार होती घाटे की खेती, किसानों पर बढ़ता कर्ज आदि ऐसे तत्व हैं जिनके कारण किसानों की हालत लगातार खराब होती गई है। सरकारें कोई भी सुधार कार्यक्रम लागू करने की इच्छुक नहीं हैं।

 -वर्तमान केन्द्र सरकार का किसानों को लेकर क्या रवैया है?

कोहाड़:- यूपीए हो या एनडीए की सरकारें, किसानों की दशा सुधारने के बड़े-बड़े वादे तो करती रही हैं, लेकिन कोई भी प्रभावशाली कदम नहीं उठाया गया है। 2005 में स्वामीनाथन आयोग द्वारा प्रस्तुत सिफारिशों को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के वक्त वादा किया था कि किसानों को एक सिफारिश के अनुरूप सी2+50प्रतिशत (जमीन का किराया व 10 फीसदी मैनेजमेंट खर्च मिलाकर) के अनुरूप फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा लेकिन अब पांचवें वर्ष में पहुंचकर केन्द्र सरकार ए2+एफसी (जिसमें जमीन का किराया व मैनेजमेंट खर्च शामिल नहीं है) देने की मंशा जता रही है। यह सरासर वादाखिलाफी है जिससे किसान बेहद आहत और आक्रोशित हैं। 

-एक मुद्दा बहुत चर्चा में है, वह है किसानों पर कर्ज। इसे लेकर किसानों की क्या स्थिति है? 

कोहाड़:- देश का शायद ही ऐसा कोई किसान होगा, जिस पर कर्ज न हो। हम कर्जमाफी की नहीं, कर्ज से मुक्ति की मांग करते हैं। माफी तो अपराधी को दी जाती है और किसान कोई अपराधी नहीं हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का ही मानना है कि अगर किसानों को सही एमएसपी दिया जाता तो उन पर कोई कर्ज नहीं होता। एक उदाहरण आपको देता हूं। 2016-17 की रिपोर्ट के अनुसार किसानों को प्रति क्विंटल गेहूं पर 119 रुपये का नुकसान हुआ था। उस वर्ष देश में 94.5 करोड़ क्विंटल गेहूं का उत्पादन हुआ था। इस हिसाब से अकेले गेहूं पर 11252 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। अगर हम स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार 2006 से किसानों को गेहूं की पूरी कीमत देते तो उसका इतना घाटा कम हो जाता। कपास पर प्रति क्विंटल 1720 रुपये का उसे घाटा होता है। ऐसे ही सभी फसलों पर किसान भारी नुकसान उठा रहे हैं। 2006 से 2018 तक देश के किसानों को हर वर्ष लगभग 50 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता आया है। आज किसानों पर जो 6 लाख करोड़ का कर्ज है वह नहीं होता।  

- सरकारों की नीतियां किसानों को लेकर किस प्रकार होती हैं? 

कोहाड़:- हमारे नीतिकार वे लोग हैं, जो न कभी खेतों में उतरते हैं और न ही मंडियों में जाते हैं। वे दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर नीतियां और कार्यक्रम बनाते हैं। चूंकि उन्हें जमीनी हकीकत का पता नहीं होता, कोई भी कार्यक्रम प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं हो पाते। इतना ही नहीं, उनकी बनाई योजनाएं बेहद अव्यवहारिक और किसानों के लिए घातक साबित होती हैं। वह चाहे मध्यप्रदेश की भावान्तर योजना हो या किसानों की बीमा फसल योजना। भावान्तर योजना तो पूरी तरह पूंजीपतियों के पक्ष में बनाई गई है। 

-नई अर्थव्यवस्था में किसान कहां खड़ा है?

कोहाड़:-अब प्रत्येक सरकार की कृषि संबंधी नीतियां किसानों के पूरी तरह विपरीत हैं। वे विश्व व्यापार संगठन और विश्व बैंक के प्रभाव में काम करती हैं। 2022 तक किसानों की अधिकतर सब्सिडी समाप्त कर दिए जाने का लक्ष्य है। इसके अंतर्गत हर वर्ष भी सब्सिडी घटाने के टारगेट दिए जाते हैं, उनसे किसानों की हालत लगातार खराब होती जा रही है। पूर्व वित्तमंत्री अरुण जेटली वर्ष 2021 तक देश में किसानों की संख्या 43 प्रतिशत घटाने के लिए कटिबद्ध हैं। फिलहाल हमारे यहां करीब 60 करोड़ लोग कृषि व्यवसाय में संलग्न हैं। लक्ष्य के मुताबिक 20 फीसदी लोगों को खेती के काम से हटा दिया जाना है। सरकार को इस बात की चिंता नहीं कि इससे जो उत्पादन घटेगा और इतने लोग बेरोजगार होंगे, उसका समाधान क्या है। कृषि घटाए जाने का उद्देश्य शहरीकरण का विकास और कांक्रीट के जंगल खड़े करने हैं। भूमंडलीकरण और नई विश्व आर्थिक व्यवस्था ने किसानों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। सब्सिडी समाप्त करने के अलावा जीएम बीजों की अनिवार्यता आदि कारणों से भी किसान बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है। इन सबके कारण किसानों पर अरबों रुपये का कर्ज हो गया है, वे आत्महत्याएं कर रहे हैं या बहुत ही विपन्न स्थिति में पहुंच गए हैं।  

-वैसे तो यह आंदोलन मूलत: किसानों का है, लेकिन क्या इसमें शहर के लोग भी शामिल हो रहे हैं?

कोहाड़ : जी हां! हमें अनेक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से समर्थन मिल रहा है अनेक युवा और पढ़े-लिखे तथा बुद्धिजीवी भी इसमें शामिल हो रहे हैं। वे इस बात को समझ रहे हैं कि किसानों की मेहनत और उनके उत्पादन के बिना भारत पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। किसानों की लड़ाई दरअसल समग्र देश की निर्णायक लड़ाई है। किसान ही नहीं बचेंगे तो शहर भी नहीं बचे रहेंगे। मैं शहरवासियों से और कृषि क्षेत्र से बाहर के लोगों से उम्मीद करता हूं कि वे किसानों के दर्द को समझेंगे और इस आंदोलन को पूरा सहयोग देंगे।  

Source:Agency