हम धरती की नालायक संतान हैं

By Jagatvisio :06-06-2018 08:32


आज पूरी दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस मना रही है। 1974 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने पर्यावरण की सुरक्षा और जागरूकता बढ़ाने के लिए पर्यावरण दिवस मनाने का निश्चय किया था। तब से दुनिया भर के देश इस दिन को मनाते हैं, या यूं कह लें कि मनाने की औपचारिकता निभाते हैं। अगर सचमुच पर्यावरण की सुरक्षा और उसके लिए जागरूकता फैलाने का काम होता, तो 40 सालों में धरती की शक्ल-सूरत ही और होती। अभी तो आलम यह है कि हमारे दोहन की रफ्तार के आगे एक नहीं चार पृथ्वियां भी कम पड़ेंगी। विकास के नाम पर हम धरती का खजाना लूटते जा रहे हैं। हवा, पानी, नदी, पहाड़, जंगल, जानवर हर किसी का शिकार किया जा रहा है। और उसके बाद पर्यावरण दिवस मनाकर मानो हम अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहते हैं। लेकिन इसका भी कोई असर नजर नहीं आ रहा है। अभी बाकी दुनिया को छोड़ें केवल भारत की ही बात करें तो हकीकत सामने आ जाएगी।

भारत में इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का कार्यक्रम आयोजित हुआ और उसकी थीम यानी केन्द्रीय विषय प्लास्टिक प्रदूषकों से निपटना रखा गया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने-अपने संदेश भी दिए और पर्यावरण संरक्षण के लिए अपने इरादों को जतलाया। वैसे इस बात पर विचार करना चाहिए कि हर अवसर, हर दिवस पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के ट्वीटनुमा संदेशों से आखिर लाभ क्या होता है? क्या ये महज औपचारिकताएं नहीं होती हैं? घिसे-पिटे जुमलेनुमा वाक्यों को संदेश का नाम दे देने से क्या उन दिवसों की महत्ता बढ़ जाती है? क्या उनसे जनजागरूकता फैलती है? पर्यावरण दिवस पर संदेश देने के सुयोग्य अधिकारी तो वे लोग होते हैं जो सचमुच इस क्षेत्र में ईमानदारी से काम कर रहे हैं? जिन्हें अपने मकसद की फिक्र है, प्रचार की नहीं।

बिहार में एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं अनिल राम, जो अब तक सड़क किनारे 15 सौ पेड़ लगा चुके हैं, ताकि राहगीरों को छाया मिल सके, इसी तरह चेन्नई में एक कैमरा सुधारने वाले कारीगर हैं जोसेफ सेकर, जो बीते 15 सालों से रोजाना लगभग 6 हजार तोतों को खाना खिलाते हैं। वे रोज 30 किलो चावल तोतों, कबूतरों, गिलहरियों के लिए डालते हैं। और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इसमें लगा देते हैं। जोसेफ जिस किराए के मकान की छत पर हजारों तोतों का पेट भरते हैं, उसका मालिक अब उस मकान को गिराना चाहता है और जोसेफ की चिंता यह है कि अगर ऐसा हुआ तो उन तोतों का क्या होगा? क्या अनिल राम और जोसेफ सेकर जैसे लोगों को पर्यावरण रक्षा का संदेश देने के लिए आगे नहीं बढ़ाना चाहिए?

उनकी तरह बहुत से गुमनाम लोग इस धरती के प्रति अपना-अपना दायित्व निभा रहे हैं। लेकिन जनता के सामने तस्वीर आती है उन लोगों की जो कहीं संरक्षित वन क्षेत्र में आध्यात्म का आश्रम बनाते हैं, कहीं विश्वशांति का संगीत बजाने के लिए नदी और खेतों को उजाड़ते हैं। 
पर्यावरण पर राजनीति, धर्म और उद्योग की मिलीभगत का ही नतीजा है कि आज भारत के बड़े शहर गंदगी में भी दुनिया में नाम कमा रहे हैं।

दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में हमारे देश के कई शहरों का नाम शुमार है। दिल्ली की हवा सांस लेने लायक नहीं है। मुंबई में पहली ही बारिश में शंघाई की हकीकत दिख रही है। गर्मियों में पर्यटकों के पसंदीदा स्थल शिमला में अपील की जा रही है कि पर्यटक यहां न आएं क्योंकि भारी जलसंकट खड़ा हो गया है। आलम यह है कि पानी की कमी के कारण स्कूलों को पांच दिन के लिए बंद कर दिया गया है। जो शिमला चीड़ और देवदारों के घने जंगल, पहाड़ी झरनों के कारण मशहूर था, उसकी ऐसी बेकद्री की गई कि वह बूंद-बूंद को मोहताज हो गया। जिस प्लास्टिक को खतरा बताकर इस बार की पर्यावरण दिवस की थीम रखी गई है, उसका प्रतिबंध के बावजूद किस तरह बेधड़क इस्तेमाल होता है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में विश्व पर्यावरण दिवस का कार्यक्रम भारत में होने को बड़ी उपलब्धि बताया था। यह उपलब्धि तो तब होती, जब हम दुनिया के सामने कोई मिसाल पेश कर सकते। अभी तो यह सोचने की बात है कि क्या हम इस लायक है कि विश्व पर्यावरण दिवस मना सकें? 

Source:Agency