2019 के लिए कश्मीर कार्ड

By Jagatvisio :23-06-2018 08:25


अचरज की बात नहीं है कि इन तीन सालों में और खासतौर पर महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद से, पीडीपी-भाजपा गठजोड़ सरकार, दोनों पार्टियों के बीच टकराव के चलते, एक संकट से दूसरे संकट की ओर ही लुढ़कती रही थी। 

जम्मू-कश्मीर की भाजपा-पीडीपी सरकार के गिरने पर, वाकई कोई आंसू नहीं बहाएगा। अचरज की बात यह नहीं है कि अपने कार्यकाल के बीच में, तीन साल में ही यह गिर गई। अचरज की बात यह है कि यह सरकार तीन साल चल गई। 1 मार्च 2015 को जब महबूबा मुफ्ती के पिता के, मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भाजपा के साथ गठजोड़ कर के सरकार बनाई थी, तभी से पीडीपी के राजनीतिक विरोधी ही नहीं, जम्मू-कश्मीर के हालात के अधिकांश तटस्थ प्रेक्षक भी इस पर एकमत थे कि यह सरकार चल ही नहीं सकती है। ऐसा मानने की वजह यह नहीं थी कि गठजोड़ के लिए तैयार हुई पीडीपी और भाजपा, इस राज्य में सत्ता तक पहुंच के लिए ऐसे समझौते करने के लिए तैयार नहीं थीं, जिन्हें उनके घोषित रुख को देखते हुए अवसरवादी ही कहा जा सकता था।

केंद्र में भाजपा का एकछत्र राज कायम होने की पृष्ठïभूमि में, 2014 के आखिर में हुए जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव में आए खंडित जनादेश की पृष्ठïभूमि में दोनों पार्टियां अपने-अपने कारणों से गठजोड़ के लिए अतिरिक्त रूप से झुकने के लिए तैयार थीं। विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर आई पीडीपी के लिए यह 'अभी नहीं तो कभी नहींं' का सवाल था, तो पहली बार विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आई भाजपा के लिए भी यह 'अभी नहीं तो कभी नहीं' का ही सवाल था। अचरज नहीं कि उन्होंने यह गठजोड़ किया।

लेकिन समस्या यह थी कि जो चुनावी राजनीतिक सचाई इन दोनों पार्टियों को यह 'मजबूरी की शादी' करने की ओर धकेल रही थी, वही सच्चाई इसका अवसरवादी से बढ़कर एक अप्राकृतिक गठजोड़ बना रहना भी पक्का कर रही थी।

याद रहे कि इस चुनाव में मोदी लहर के बल पर भाजपा, जम्मू-कश्मीर विधानसभा में दो दर्जन का आंकड़ा पार करने में ही कामयाब नहीं रही थी, वह एक ओर तो जम्मू की लगभग तमाम हिंदू बहुल सीटें जीतने में कामयाब रही थीं और दूसरी ओर खासतौर कश्मीर की घाटी में उसे न सिर्फ एक भी सीट नहीं मिली थी बल्कि बताने लायक वोट भी नहीं मिले थे। इस तरह केंद्र में मोदी का राज होने के बावजूद भाजपा हिंदुत्व के बल पर, न सिर्फ हिंदू-प्रधान जम्मू की सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई थी बल्कि सिर्फ हिंदू-प्रधान जम्मू की ही पार्टी बनकर सामने आई थी। यह जम्मू-कश्मीर में धीरे-धीरे बढ़ते रहे सांप्रदायिक विभाजन का, औपचारिक राजनीति तथा अंतत: सत्ता के स्तर तक पहुंचना था।

बेशक, यह सच्चाई गठजोड़ सरकार बनाने जा रहीं पीडीपी और भाजपा से भी छिपी हुई नहीं थी। लेकिन खासतौर पर पीडीपी तथा उसके हमदर्दों की ओर से इस गठजोड़ को, इसी सच्चाई के सहारे और यह कहकर जरूरी ठहराने की कोशिश की जा रही थी कि राज्य में खासतौर पर हिंदू जम्मू तथा मुस्लिम कश्मीर के बीच की खाई को पाटने के लिए, एक 'बड़ी सुलह' की जरूरत थी और इसे जम्मू से अधिकांश सीटें लेने वाली भाजपा और कश्मीर से सबसे ज्यादा सीटें लेने वाली पीडीपी का गठबंधन ही संभव बना सकता है। इसके साथ ही उसने कश्मीरियों के बढ़ते अलगाव को दूर करने के लिए, सभी हितधारकों के साथ संवाद समेत जम्मू-कश्मीर के हित के तकाजों को और जोड़ दिया। दोनों पार्टियों द्वारा स्वीकार किया गया एजेंडा फॉर एलाइंस इसी प्रयास का दस्तावेजी आधार था। 

बहरहाल, चाहे भोलेपन में हो या सत्ता के लालच में, पीडीपी के इस गठजोड़ के पैरोकार, मोदी सरकार के 'सब का साथ सब का विकास' जैसे जुमलों पर कुछ ज्यादा ही भरोसा कर के, इस गठजोड़ में निहित बुनियादी असंतुलन को अनदेखा ही कर रहे थे। भाजपा ने अगर उक्त समझौते के हिस्से के  तौर पर इसके लिए हामी भर दी थी कि जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे से संबंधित संविधान की धारा-370 के साथ छेड़छाड़ नहीं की जाएगी और कश्मीर समस्या के समाधान के लिए न सिर्फ अलगाववादियों से बल्कि पाकिस्तान से भी बातचीत की जाएगी, तो उसने ऐसा कोई इन मुद्दों पर अपना रुख बदलने के लिए तैयार होने की वजह से नहीं किया था।

बेशक, उसने ऐसा इस राज्य में पहली बार सत्ता तक पहुंच हासिल करने के लिए तो किया ही था, इसके साथ ही इस सच्चाई को पहचानने के आधार पर भी किया था कि केंद्र की सत्ता तक पहुंच के बल पर वह, राज्य सरकार के किसी भी प्रयास पर अंकुश लगा सकती है या उसे रोक या विफल कर सकती है। इस तरह वह, एक ओर तो इस राज्य में सत्ता तक पहुंच की सहायता से, हिंदुओं के समर्थन के सुदृढ़ीकरण तथा विस्तार के हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने की उम्मीद कर रही थी।

दूसरी ओर केंद्र के स्तर से कश्मीर यानी मुसलमान यानी अलगाववादी यानी पाकिस्तान के प्रति कथित 'हार्ड लाइन' या 'मस्कुलर' नीति के जरिए, जम्मू समेत देश भर में हिंदुत्ववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने की उम्मीद कर रही थी। जैसी कि अनेक धर्मनिरपेक्षता-प्रेमियों की आशंका थी, देश तथा जम्मू-कश्मीर के दुर्भाग्य से भाजपा ही इस गठजोड़ के जरिए अपने मंसूबों का आगे बढ़ाने में कामयाब रही है, जबकि पीडीपी की उम्मीदें झूठी साबित हुई हैं।

अचरज की बात नहीं है कि इन तीन सालों में और खासतौर पर महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद से, पीडीपी-भाजपा गठजोड़ सरकार, दोनों पार्टियों के बीच टकराव के चलते, एक संकट से दूसरे संकट की ओर ही लुढ़कती रही थी। बेशक, यह सबसे बढ़कर केंद्र में मोदी सरकार के खासतौर पर कश्मीर व अलगाववादियों के प्रति, मुख्यत: सुरक्षा बलों के प्रयोग पर आधारित कथित 'हार्ड' अपनाने की वजह से हो रहा था। लेकिन, उस पैमाने पर न सही, खुद जम्मू-कश्मीर में भी गोमांस से लेकर कश्मीरी पंडितों तक, सभी संभव मसलों पर भी यह टकराव हो रहा था। वास्तव में इस गठजोड़ के राज में 'महा-सुलह' की जगह सांप्रदायिक महा-कलह को ही बढ़ावा मिल रहा था।

इसका भयावह सबूत कुख्यात कठुआ बलात्कार-हत्या कांड में सरकार के मंत्रियों समेत राज्य भाजपा का ही अपराधियों के बचाव में तिरंगा झंडा लेकर सड़कों पर उतरना था।

फिर भी, हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर की घाटी में उठी विरोध की आम लहर ने, महबूबा मुफ्ती की सरकार के पांव तले से जमीन ही खींच ली। अपने स्वभाव के अनुरूप मोदी सरकार ने विरोध की इस लहर को सुरक्षा बलों के सहारे कुचलने की जो कोशिश की थी, वह सबसे ज्यादा सफल हुई तो महबूबा मुफ्ती का जनाधार खत्म करने में। यहां से आगे, सुलह-समझौते तथा संवाद की नीति की मुख्यमंत्री की बार-बार की पुकार, केंद्र सरकार को तो नहीं ही मना सकी, उसने खुद गठजोड़ सरकार को व्यावहारिक मानों में दो-फाड़ कर दिया।

इन हालात में न सिर्फ भारतीय शासन से कश्मीर की जनता का अलगाव अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया बल्कि एक ओर मिलिटेंटों की कतारों में पढ़े-लिखे स्थानीय युवाओं की भर्ती में भारी तेजी तथा दूसरी ओर लोगों के बीच सुरक्षा बलों का डर ही न रहने के चलते, हालात तेजी से बिगड़े हैं, जहां मिलेंटेंसी को बढ़ते पैमाने पर आम लोगों का समर्थन मिल रहा है। इसी पृष्ठïभूमि में रमजान युद्घ विराम की सीमित सफलता, लेकिन संघ परिवार की नजर में 'विफलता' के बहाने से भाजपा ने, मुफ्ती सरकार से समर्थन वापस लेकर, राज्यपाल के शासन के माध्यम से जम्मू-कश्मीर में केंद्र के और प्रत्यक्ष शासन का रास्ता खोल दिया है।

भाजपा नेताओं के बयानों से साफ है कि केंद्र के इस और प्रत्यक्ष शासन का अर्थ, पहले से चल रही 'हार्ड लाइन' का और हार्ड होना यानी और खुलकर दमनकारी कदमों का इस्तेमाल करना ही होगा। वास्तव में और हार्ड होने की खास गुंजाइश भले ही न हो, कम से कम और हार्ड नीति का ढोल जरूर पीटा जाएगा। इससे कश्मीर के हालात और खराब होंगे तो उनकी बला से, उन्हेें तो इसमें शेष देश भर को हिंदुत्व तथा राष्टï्रवाद की कॉकटेल पिलाकर मदहोश करने का ही मौका नजर आ रहा है। अब जब देश की राजनीतिक हवा पलटती नजर आ रही है, संघ परिवार को ऐसी मदहोशी के सामान की बहुत जरूरत है।
 

Source:Agency