राजनीति से परे हों नीति आयोग की बैठकें

By Jagatvisio :26-06-2018 08:04


नीति आयोग की संचालक परिषद यानी 'गवर्निंग काउंसिल' की चौथी बैठक में 'न्यू इंडिया 2022' का एजेंडा जब राज्यों के समक्ष रखा गया तो कुछ मुख्यमंत्रियों ने असहजता दिखाई। उनका तर्क था कि उनके राज्यों की जरूरतें तात्कालिक आधार पर पूरी की जानी चाहिए, पर केंद्र चार-पांच साल बाद की बात कर रहा है, वैसे भी पूर्व में उनके किए गए वादे अभी अधूरे हैं। मुख्यमंत्रियों के बीच भी दो तरह के गुट दिखे, एक वे, जहां भारतीय जनता पार्टी या उसके सहयोगी दलों की सत्ता है, और दूसरी तरफ विपक्षी दलों के मुख्यमंत्री।

नीति आयोग का 'नीति', योजना या रणनीति का वैकल्पिक शब्द न होकर अंग्रेजी के 'एनआईटीआई' से बनाया गया, जिसका फुल फार्म 'नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' है, हिंदी में इसे 'राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था' के नाम से स्थापित किया गया और टैग लाइन रखी गई, 'राज्यों के साथ कामकाज-सहकारी संघवाद।' इसके लक्ष्य में यह लिखा गया कि मूल रूप से केंद्र-राज्य संबंधों को फिर से परिभाषित करने के लिए, एनआईटीआई आयोग ने पहली बार यह सुनिश्चित किया है कि सभी राज्य केंद्र सरकार को नीतिगत हस्तक्षेप प्रदान करने में अग्रणी भूमिका निभाएं।  एनआईटीआई आयोग, सहकारी संघवाद के लिए एक मंच है, जो संघ और राज्यों के साथ मिलकर समान रूप से काम करने की सुविधा प्रदान करता है।

जाहिर है इस आयोग का मकसद योजनागत मामलों में दोनों पक्षों को बराबरी का अवसर प्रदान करना ही है। पर जिस जोश-खरोश से इसका स्वरूप बदला गया, उस रूप में इसकी भूमिका अभी तक दिखी नहीं है। नौकरशाही के प्रभाव में बहुत जल्द ही यह योजना आयोग के ढर्रे पर चलने लगी, और इस साल भी नीति आयोग की परंपरागत बैठक में पिछले साल हुए कार्यों की समीक्षा और आने वाले साल के लिए विकास के एजेंडे को किस तरह आगे बढ़ाया जाए इसकी रूपरेखा रखी गई, पर नीति आयोग ने 2017 में दिए अपने प्रजेंटेशन में जिन छह समस्याओं- गरीबी, गंदगी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद और सांप्रदायिकता को प्रमुखता दी थी, उसकी सफलता की समय सीमा साल 2022 तक बढ़ा दी।

नीति आयोग की संचालक परिषद यानी 'गवर्निंग काउंसिल' की चौथी बैठक में 'न्यू इंडिया 2022Ó का एजेंडा जब राज्यों के समक्ष रखा गया तो कुछ मुख्यमंत्रियों ने असहजता दिखाई। उनका तर्क था कि उनके राज्यों की जरूरतें तात्कालिक आधार पर पूरी की जानी चाहिए, पर केंद्र चार-पांच साल बाद की बात कर रहा है, वैसे भी पूर्व में उनके किए गए वादे अभी अधूरे हैं। मुख्यमंत्रियों के बीच भी दो तरह के गुट दिखे, एक वे, जहां भारतीय जनता पार्टी या उसके सहयोगी दलों की सत्ता है, और दूसरी तरफ विपक्षी दलों के मुख्यमंत्री। केंद्र सरकार के कामकाज और उसकी योजनाओं और अनुदान को लेकर इन दोनों ही पक्षों के मुख्यमंत्रियों की अलग तरह की राय रही। यों तो आजादी के बाद से ही केंद्र और राज्य सरकारों के बीच कामकाज को लेकर चली आ रही सालाना परंपरागत बैठकों में ऐसे दृश्य आम हैं, पर पहले यह बैठकें योजना आयोग के बैनर तले होती थीं, जिसमें केंद्र सरकार का दबदबा साफ-साफ दिखता था, इसलिए मुख्यमंत्रियों का ऐतराज समझ में भी आता था, पर 2014 के आम चुनावों में जब दिल्ली में केंद्र की सत्ता पर लंबे समय तक गुजरात में मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में काबिज हुए तो उन्होंने राज्यों के पक्ष में कुछ बड़े बदलाव किए, जिनमें से पहला था, योजना आयोग का नाम बदल कर 'नीति आयोग' कर देना।

नीति आयोग, बौद्धिक, व्यावसायिक और अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञों की जगह है, और इनसे इस बात की उम्मीद नहीं की जाती कि वे राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा-पत्रों की तरह लोकलुभावन वादे करेंगे, जिनके हकीकत में बदलने के अवसर एक पंचवर्षीय अवधि के दौरान पचास फीसदी भी नहीं होते। आयोग का एजेंडा था कि हमारा जोर रहेगा कि हम राज्यों से जानें, कि साल 2022 तक देश की तस्वीर कैसे बदली जाए, जब भारत आजादी की 75वीं सालगिरह मनाएगा। इसमें किसानों की आमदनी दोगुनी करने की दिशा में उठाए गए कदमों, आयुष्मान भारत कार्यक्रम की प्रगति, राष्ट्रीय पोषण मिशन और मिशन इंद्रधनुष के साथ-साथ देशभर में महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ मनाने जैसे मामलों पर चर्चा के साथ ही देश के मौजूदा आर्थिक हालात और नीति आयोग के काम काज का ब्योरा भी रखा गया।  पर जैसा कि अमूमन होता रहा है, इस बैठक की शुरुआत ही सियासत से हुई।

आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री के दफ्तर से जारी एक वक्तव्य में कहा गया कि बैठक का एजेंडा पिछले साल के मुताबिक बहुत सीमित है। पिछली बैठक में स्वच्छ भारत, स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी, लेकिन इस बैठक के एजेंडे से वे मुद्दे गायब हैं। केंद्र को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस दिशा में क्या प्रगति हुई। इसी तरह एटीएम में कैश की किल्लत, किसानों की दिक्कतों, बेरोजगारी और फसल बीमा योजना में आ रही मुश्किलों को भी चर्चा के एजेंडे में क्यों शामिल नहीं किया गया? बहरहाल बैठक हुई और उसमें कुछ विवादास्पद मसलों पर भी चर्चा हुई, जिनमें बिहार और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्रियों द्वारा अपने-अपने राज्यों के लिए विशेष राज्य का दर्जा मांगना भी शामिल था। इसी तरह अलग-अलग वजहों से दिल्ली, गोवा, जम्मू-कश्मीर, ओडिशा, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा के मुख्यमंत्रियों की अनुपस्थिति से भी एक अलग संकेत गया।

'टीम इंडिया' की इस बैठक में सहकारिता, प्रतिस्पर्धी संघवाद की भावना, जीएसटी के सुगम आरंभ एवं क्रियान्वयन, स्वच्छ भारत मिशन, डिजिटल लेनदेन एवं कौशल विकास जैसे मुद्वों पर उप-समूहों एवं समितियों के जरिये नीति निर्माण में राज्यों के मुख्यमंत्रियों की भूमिका, भारतीय अर्थव्यवस्था 2017-18 की चौथी तिमाही में 7.7 प्रतिशत की बढ़त, विकास दर को दो अंकों में ले जाने और किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य, आयुष्मान भारत, मिशन इंद्रधनुष, पोषण मिशन एवं महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के समारोहों, मुद्रा योजना, जन धन योजना एवं स्टैंड अप इंडिया जैसी योजनाओं के वित्तीय समावेश और प्राथमिकता के आधार पर आर्थिक असंतुलनों से निपटने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। इसके अलावा मानव विकास के सभी पहलुओं एवं मानकों पर ध्यान दिए जाने के साथ ही 115 आकांक्षापूर्ण जिलों में बेहतरी लाए जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।

ग्राम स्वराज अभियान योजनाओं के कार्यान्वयन के एक नए मॉडल के रूप में आकांक्षापूर्ण जिलों के 45,000 गांवों में सात महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाओं उज्जवला, सौभाग्या, उज्जवला, जन धन, जीवन ज्योति योजना, सुरक्षा बीमा योजना एवं मिशन इंद्रधनुष में सार्वभौमिक कवरेज के लक्ष्य पर भी बात की गई और चालू वित्त वर्ष के दौरान राज्यों को केंद्र से 11 लाख करोड़ रुपए से अधिक देने का भरोसा दिया गया। काश, नीति आयोग की बैठक का यह जज्बा सियासत से परे हकीकत की जमीन पर भी इसी तेवर में उतर पाता।
 

Source:Agency