संरक्षणवाद के पक्ष में

By Jagatvisio :28-06-2018 08:10


राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा मुक्त व्यापार से पीछे हटना अमरीकी नागरिकों के लिए खट्टा-मीठा परिणाम देगा। एक तरफ उनके लिए रोजगार बनेंगे क्योंकि भारत से स्टील तथा एल्युमिनियम कम आयेगा और इनका उत्पादन अमेरिका में होगा। लेकिन दूसरी तरफ भारत के द्वारा प्रतिक्रिया में आयात कर बढ़ाने से अमेरिका में निर्यात भी घटेंगे। तकनीकी आविष्कारों की कमी के कारण अमेरिका के निर्यात पहले ही प्रभावित थे। अब ये और ज्यादा प्रभावित होंगे।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आयात होने वाले स्टील तथा एल्युमिनियम के उत्पादों पर आयात कर बढ़ा दिए हैं।  इसकी जवाबी कार्रवाई में अमेरिका से आयातित होने वाले बड़ी क्षमता की मोटर साइकिल एवं बादाम पर भी आयात कर बढ़ाने का मन बनाया है। इस प्रकरण से स्पष्ट होता है कि मुक्त व्यापार का सिद्धांत कारगर नहीं रह गया है। 

नब्बे के दशक में अमेरिका मुक्त व्यापार का समर्थक था। अमेरिका ने बड़े जतन से विश्व व्यापार संधि को लागू किया था और वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूटीओ) बनवाया था। उस समय अमेरिका में नई तकनीकों का आविष्कार हो रहा था। जैसे माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी ने विंडो सॉफ्टवेयर का आविष्कार किया था। इस सॉफ्टवेयर को बनाने में माइक्रोसॉफ्ट को लगभग एक डॉलर प्रति सॉफ्टवेयर का खर्च आता है जबकि उस समय वह दस डॉलर में बेच रहा था। इसी प्रकार सिस्को सिस्टम के द्वारा इन्टरनेट के राउटर, आईबीएम तथा हयूवेट पेकार्ड द्वारा कम्प्यूटर बना करके पूरी दुनिया को सप्लाई किये जा रहे थे। मोनसानटो द्वारा जीन परिवर्तित बीज जैसे बीटी काटन बना कर निर्यात किये जा रहे थे। इन हाईटेक उत्पादों के निर्यात से अमेरिका को भारी लाभ हो रहा था इसलिए अमेरिका के लिए उस समय मुक्त व्यापार डबल लाभ का सौदा था। अमरीकी कम्पनियों को अपने हाईटेक उत्पादों को पूरी दुनिया में बेचने का मौका मिल रहा था। दूसरी तरफ भारत जैसे देशों से सस्ते कपड़े और खिलौने अमरीकी उपभोक्ता को मिल रहे थे। 

बीते दो दशक से परिस्थिति में मौलिक परिवर्तन हो गया है। आज अमेरिका में विंडो सॉफ्टवेयर जैसे नये उत्पाद नहीं बन रहे हैं। इंटरनेट का चीन ने अपना विकल्प बना लिया है। चीन तथा कोरिया में बड़ी मात्र में आधुनिक कम्प्यूटर बन रहे हैं। भारत में जीन परिवर्तित जैसे बीज महिको जैसी कम्पनियां बना रही हैं। इस प्रकार अमेरिका के लिए हाईटेक उत्पादों का व्यापार करना कठिन हो गया है। फलस्वरूप अमेरिका के निर्यात दबाव में हैं जबकि आयात बढ़ रहे हैं। आयातों के बढ़ने से अमरीकी मजदूरों का हनन हो रहा है। जबकि हाईटेक उत्पादों के निर्यात में कमी आने से भी अमरीकी मजदूरों का हनन हो रहा है।

इस समस्या से उबरने के लिए राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत से आयातित होने वाले स्टील तथा चीन से आयातित होने वाले तमाम उत्पादों पर आयातकर बढ़ा दिए हैं। उनकी सोच है कि भारत तथा चीन से माल नहीं आयेगा तो उन माल का उत्पादन अमेरिका में होगा। नागरिकों के लिए रोजगार बनेगा और मतदाताओं के बीच उनकी पैठ बनी रहेगी। इसलिए ट्रम्प मुक्त व्यापार से पीछे हट रहे हैं। जिस मुक्त व्यापार को नब्बे के दशक में अमेरिका की समृद्धि का रास्ता समझा जा रहा था, उसी मुक्त व्यापार को अमेरिका के रोजगार का हनन का कारण माना जा रहा है। 

राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा मुक्त व्यापार से पीछे हटना अमरीकी नागरिकों के लिए खट्टा-मीठा परिणाम देगा। एक तरफ उनके लिए रोजगार बनेंगे क्योंकि भारत से स्टील तथा एल्युमिनियम कम आयेगा और इनका उत्पादन अमेरिका में होगा। लेकिन दूसरी तरफ भारत के द्वारा प्रतिक्रिया में आयात कर बढ़ाने से अमेरिका में निर्यात भी घटेंगे। तकनीकी आविष्कारों की कमी के कारण अमेरिका के निर्यात पहले ही प्रभावित थे। अब ये और ज्यादा प्रभावित होंगे। रोजगार की दृष्टि से ट्रम्प की पॉलिसी सही दिखती है। लेकिन साथ-साथ भारत के सस्ते स्टील तथा एल्युमिनियम के अनुपलब्ध हो जाने के कारण अमरीकी उपभोक्ता को इन माल को अमेरिका में ऊंचे दाम पर खरीदना होगा। अत: एक तरफ रोजगार का मीठा परिणाम होगा तो दूसरी तरफ माल के दाम में वृद्धि का खट्टा परिणाम होगा।          

इस पृष्ठभूमि में भारत को तय करना है कि हम मुक्त व्यापार को अपनायेंगे या इससे पीछे हटेंगे। मुक्त व्यापार के हमारे लिए दो पहलू हैं। पहला पहलू विदेशी निवेश का है। सोचा गया था कि मुक्त व्यापार के साथ अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में फैक्ट्रियां लगाएंगी जिससे भारत को उच्च तकनीकी एवं विदेशी निवेश दोनों मिलेगा।  लेकिन जैसा ऊपर बताया गया है आज अमेरिका के पास उच्च तकनीकी ना होने के कारण विदेशी निवेश के आधार पर भारत में इनका आना कम ही हो गया है। दूसरा पहलू है कि यदि हम वैश्वीकरण को अपनाए रखते हैं, तो भी हमरे निर्यात कम होंगे क्योंकि अमेरिका द्वारा मुक्त व्यापार को त्याग दिया जा रहा है और अमेरिका द्वारा हमारे माल पर अधिक आयातकर लगाया जा रहा है। 

इस परिस्थिति में मेरी दृष्टि से हमें भी ट्रम्प का अनुसरण करते हुए मुक्त व्यापार से पीछे हटकर संरक्षणवाद की नीति अपनानी चाहिए। विदेशी निवेश के स्थान पर घरेलू निवेश को प्रोत्साहन देना चाहिए। इस बात के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं कि भारत के उद्यमी आज भारत में निवेश करने के स्थान पर विदेशों में कारखाने लगाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। विदेशी निवेश के माध्यम से नई तकनीकों को हासिल करने के स्थान पर भारत को स्वयं नई तकनीकों के आविष्कार के प्रयास करने चाहिए तथा अपनी यूनिवर्सिटियों आदि में रिसर्च के भारी प्रोग्राम लेने चाहिए। ऐसा करने से हम घरेलू निवेश एवं घरेलू तकनीकों के आधार से आगे बढ़ सकें। 

इस संरक्षणवाद को अपनाने में मुख्य समस्या सरकारी नौकरशाही की है। आज भारत सरकार के कुल बजट में लगभग पचास प्रतिशत रकम सरकारी कर्मचारी के वेतन एवं पेंशन में खप रही है। भारत सरकार को इनके वेतन अदा करने के लिये भारी मात्रा में बाजार से ऋण लेना पड़ रहा है। विदेशी निवेश के आने से भारत के मुद्रा बाजार में तरलता बढ़ती है और भारत सरकार के लिए ऋण लेना आसान हो जाता है। इसके विपरीत यदि घरेलू निवेश को बढ़ाया जाय तो घरेलू निवेशक और भारतीय सरकार अपने एक ही मुद्रा बाजार में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे ब्याज दर बढ़ती है और भारत सरकार के लिए उधार लेना कठिन हो जाता है।  इसलिए भारतीय नौकरशाही चाहती है कि विदेशी निवेश आये जिससे कि भारत सरकार के लिए ऋण लेना आसान हो जाए और उनको मिलने वाले वेतन तथा पेंशन में उत्तरोत्तर बढ़त होती रहे। इसमें कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। 

तकनीकी आविष्कार में भी नौकरशाही ही समस्या दिखती है। तकनीकी आविष्कार में निवेश करने के लिए भारत को भारी रकम चाहिए। लेकिन भारत सरकार का राजस्व सरकारी कर्मियों को वेतन देने में खप जा रहा है इसलिए तकनीकी आविष्कार में भारत सरकार निवेश नहीं कर पा रही है। तकनीकी आविष्कार निवेश बढ़ाने के लिए सरकारी कर्मियों के वेतन में कटौती करनी होगी। इस प्रकार मेरा मानना है कि हमें ट्रम्प की सही पॉलिसी अनुसरण करते हुए मुक्त व्यापार को त्यागकर संरक्षणवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। दुर्भाग्य है कि इस दिशा में भारत के नौकरशाही अपने स्वार्थ के लिए इस सही नीति को लागू नहीं होने दे रही है और देश गड्ढे में जा रहा है।
 

Source:Agency