फीफा : कुछ यादगार बातें

By Jagatvisio :18-07-2018 08:36


लगभग एक महीने की गहमागहमी के बाद फीफा वर्ल्डकप का समापन बीते रविवार हुआ। फ्रांस और क्रोएशिया के बीच खेले गए फाइनल मुकाबले में फ्रांस फुटबाल का नया सरताज बना। अनुभवी फ्रेंच टीम और जोश से भरी क्रोएशियाई टीम के बीच यह मुकाबला काफी रोमांचक था। अनुभव ने जोश को मात दी, लेकिन दर्शकों ने दोनों ही टीमों के खेल का खूब आनंद लिया। वैसे इस बार फीफा वर्ल्डकप का आयोजन कई बातों के लिए लंबे समय तक याद रहेगा। सबसे पहली बात तो यह कि इस आयोजन ने रूस के प्रति दुनिया का नजरिया बदला।

फीफा के मैच देखने के लिए दुनिया भर से फुटबाल प्रेमी रूस के विभिन्न शहरों में आए और यहां की मेजबानी का स्वाद चखा। जबकि अब तक पर्यटन के लिए रूस कम ही लोगों का पसंदीदा स्थल हुआ करता था। दूसरी बात, फीफा के मैचों में इस बार कई बड़े उलट फेर देखने मिले।

जर्मनी, इटली, जापान, अर्जेन्टीना, ब्राजील जैसी दिग्गज टीमें बाहर हो गईं। रोनाल्डो, मेसी जैसे नामचीन खिलाड़ी, जो फुटबाल जगत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं, इस बार अपना कमाल नहीं दिखा पाए। जबकि किलियम एमबापे, लुका मोद्रिच, हैरी केन, फुटबाल के नए हीरो बन कर निकले। तीसरी बात, फीफा के मैचों में वसुधैव कुटुम्बकम की झलक देखने मिली। कुछेक देशों की टीमों को छोड़ दें तो अधिकतर टीमों में धर्म और देश की दीवारें टूटती दिखाई दीं।

यूरोप की दस टीमों के 230 खिलाड़ियों में 83 प्रवासी थे। इनके मां-बाप या पुरखे रोजगार या बेहतर जीवन के लिए इन देशों में आकर बसे और यहीं के होकर रह गए। इस वक्त जब दुनिया में सरहदों का रंग और गाढ़ा किया जाने लगा है, कांक्रीट की दीवारें और कांटों भरी बाड़ लगाने की पैरवी की जा रही है, ताकि एक देश के लोग दूसरे देश न जा सकें, तब यह देखना सुखद लगता है कि कैसे प्रवासी मां-बाप के बच्चे अपने देश की फुटबाल टीम में न केवल शामिल होते हैं, बल्कि उसे गौरवान्वित भी करते हैं।

फ्रांस और बेल्जियम के बीच हुए सेमीफाइनल में दोनों टीमों में कुल 23 खिलाड़ी ऐसे थे, जिनकी जड़ें अफ्रीका से जुड़ती हैं। लेकिन इन देशों ने इन्हें बाहरी न मानकर खुले दिल से अपनाया और उसका फायदा उन्हें हुआ। फ्रांस के 19 साल के खिलाड़ी एमबापे फुटबाल के नए जादूगर बनकर उभर रहे हैं। एमबापे के पिता कैमरून से हैं, मां अल्जीरिया से और वे फ्रांस आकर बस गए, इस तरह एमबापे फ्रेंच टीम का हिस्सा बने। ऐसी ही कहानी बहुत से खिलाड़ियों की है। एक वक्त था जब भारत में इसी तरह अलग-अलग धर्मों, जातियों, भाषाओं, संस्कृतियों के लोग दूध-चीनी की तरह घुलमिल जाते थे। लेकिन आज हम उदारता से कट्टरता की ओर बढ़ चुके हैं और इसका नुकसान उठा रहे हैं। बहरहाल, फीफा की चौथी यादगार बात रही फाइनल मुकाबले में पहुंची क्रोएशिया की टीम।

महज 40 लाख की आबादी वाले इस देश ने लड़ाइयों का भीषण दौर देखा, बड़ी मुश्किल से अपनी पहचान हासिल की, लेकिन इसके खिलाड़ियों ने जीत का वो जज्बा दिखाया कि हर कोई उनका मुरीद हो गया। क्रोएशिया की राष्ट्रपति कोलिंदा ग्रैबर किटारोविच जिस सहज भाव से स्टेडियम में मैच देखने पहुंचीं और सेमीफाइनल व फाइनल के बाद अपने खिलाड़ियों से मिलीं, वह भी काबिले तारीफ है।

कुछ ऐसा ही अंदाज फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का भी रहा। फीफा का पांचवां यादगार पल रहा उसका समापन समारोह। जिसमें विजेता फ्रेंच टीम का स्वागत झमाझम बारिश ने किया। दर्शकों को वह दृश्य भी सालों साल याद रहेगा, जब मेजबान रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के सिर पर छाता तना था, जबकि फ्रेंच और क्रोएशियाई राष्ट्रपति बारिश में मजे से भीगते हुए अपने खिलाड़ियों से मिल रहे थे। क्रोएशिया की राष्ट्रपति कोलिंदा ने जब अपनी टीम के कप्तान लुका मोद्रिच के आंसू पोंछे, तो वह दृश्य दर्शकों को भावुक कर गया। हालांकि वे विजेता फ्रांस के एमबापे से भी पूरी गर्मजोशी से मिलीं। इस वक्त जब दुनिया में स्वार्थ और लालच का बोलबाला है, अपनी सत्ता और शक्ति की अकड़ दिखाने वाले दंभी नेताओं की तादाद बढ़ रही है,  वीवीआईपी कल्चर खत्म होने की जगह बढ़ रहा है, तब फीफा की ये बातें राहत देती हैं कि दुनिया के कुछ नेताओं में सहजता और सरलता अभी बाकी है।
 

Source:Agency