जनतांत्रिक चुनाव में साम्प्रदायिकता का क्या काम है?

By Jagatvisio :20-07-2018 08:17


प्रधानमंत्री ने 2014 का चुनाव नौजवानों के लिए नौकरी, महिलाओं की सुरक्षा, आर्थिक तरक्की, भ्रष्टाचार का खात्मा। लोकपाल की तैनाती जैसे मुद्दों के बारे में वायदा कर के लड़ा था। देश की जनता  ने उनका विश्वास किया और उनको वोट दिया।  हालांकि उस चुनाव में भी मुजफ्फरनगर के दंगे का जाक्र उनकी पार्टी के ज़्यादातर नेताओं ने किया था।  मुजफ्फरनगर के  दंगे के बहुत सारे अभियुक्त बीजेपी के चुनाव प्रचार की अगली कतार में थे लेकिन चुनाव  में जीत नरेंद्र मोदी के आर्थिक विकास के नारे, किसानों की खुशहाली, महिलाओं की सुरक्षा, पाकिस्तान को दुरुस्त करने और नौजवानों की नौकरियों के वायदे की वजह से मिली थी। 

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए राजनीतिक पार्टियों ने काम शुरू कर दिया है।  विपक्षी एकता के तरह-तरह के प्रयास किये जा रहे हैं। सबसे ताजा प्रयास लोकसभा में मोदी सरकार की खामियों को रेखांकित करने के उद्देश्य से लाया गया अविश्वास प्रस्ताव है। बीजेपी की कोशिश है कि राहुल गांधी को लगातार निशाने पर लिया जाए क्योंकि जब वे विपक्ष के साझा उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में आएं तो नरेंद्र मोदी के बरक्स उनको कमजार साबित करके चुनाव जीत लिया जाए लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है।

विपक्ष की कोशिश है कि बीजेपी के खिलाफ देश की प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में एक से अधिक गंभीर उम्मीदवार न उतारा जाए। जो जहां मजबूत हो, वहां वही चुनाव लड़कर जीते और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बाद में तय किया जाए। ऐसी स्थिति में बीजेपी के पास चुनाव को हिन्दू-मुस्लिम बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता। शायद इसी बात को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते जब अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी का दौरा किया तो उन्होंने कुछ इसी मुद्दे के आसपास चुनावी मुकाबले के संकेत दिए। वाराणसी और आजमगढ़ की सभाओं में उन्होंने चुनावी गणित के मद्दे-नजर भाषण दिया। उन्होंने आजमगढ़ में पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन किया और एक तरह से लोकसभा चुनाव के प्रचार की शुरुआत कर दी। आम तौर पर प्रधानमंत्री और बीजेपी की तारीफ करने वाले एक हिंदी अखबार ने  आजमगढ़ की सभा की रिपोर्ट इस तरह से की, जैसे वह वीरगाथाकाल के साहित्यकारों की परम्परा में लिख रहा हो।

 अखबार लिखता है कि, 'परिवारवाद पर चोट करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि मोदी हो या योगी अब तो आप ही लोग हमारा परिवार हैं। आपके सपने हमारे सपने हैं। मोदी ने कहा कि इन परिवार पार्टियों की पोल तो तीन तलाक ने खोल दी है। लाखों-करोड़ों मुस्लिम बहन-बेटियों की मांग थी कि तीन तलाक को बंद कराया जाए। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम लिए बगैर प्रधानमंत्री ने कहा कि 'मैंने अखबार में पढ़ा, कांग्रेस श्रीनामदार ने कहा है कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है। पिछले दो दिनों से चर्चा चल रही है। मुझे आश्चर्य नहीं है। जब कांग्रेस की सरकार थी, तब पीएम मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के प्राकृतिक संसाधनों पर सबसे पहला हक मुस्लिमों का है। मैं तो अब श्रीनामदार से पूछना चाहता हूं, कांग्रेस पार्टी मुस्लिमों की पार्टी है, आपको ठीक लगे तो आपको मुबारक। लेकिन क्या आपकी मुस्लिमों की पार्टी सिर्फ पुरुषों की है या मुस्लिम महिलाओं तथा बहनों की भी है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के कुछ दल पार्लियामेंट में कानून रोक कर बैठ जाते हैं। लगातार यह हो-हल्ला करते हैं। पार्लियामेंट नहीं चलने देते। मोदी को हटाने के लिए दिन-रात एक करने वाली पार्टियों से कहना चाहता हूं कि अभी पार्लियामेंट शुरू होने में तीन-चार दिन बाकी हैं। तलाक पीड़ित महिलाओं से मिलकर आइए, हलाला के कारण परेशान मां-बहनों से मिलकर आइए तब पार्लियामेंट में बात कीजिए। जब भाजपा सरकार ने संसद में कानून लाकर मुस्लिम बहन-बेटियों को अधिकार देने की कोशिश की तो उसमें भी रोड़े अटकाने की कोशिश कर रहे हैं। यह चाहते हैं, तीन तलाक होता रहे मुस्लिम बहन-बेटियों का जीवन नरक बनता रहे। मैं विश्वास दिलाता हूं कि मैं इन राजनीतिक दलों को समझाने की पूरी कोशिश करूंगा। उनको समझाकर हमारी बहन-बेटियों को अधिकार दिलाने के लिए उनको साथ लाने का प्रयास करूंगा। ताकि मुस्लिम बेटियों को तीन तलाक के कारण जो परेशानियां हो रही हैं, उससे मुक्ति मिल सके।'

इस अखबार की रिपोर्ट से बिल्कुल सा$फ है कि लोकसभा के अगले चुनाव में मुसलमान बड़ा मुद्दा बनने वाले हैं। प्रधानमंत्री के आजमगढ़ के भाषण से ऐसा लगता है कि उनको संकेत मिल गया  है कि पिछले चार साल में जिस तरह से आपराधिक तत्वों ने मुसलमानों को मारा पीटा है, उसके बाद उनकी पार्टी को मुसलमानों का वोट तो नहीं मिलने वाला है। प्रधानमंत्री ने इंकलाब अखबार की उस खबर का जाक्र भी किया जिसका शीर्षक था कि राहुल  गांधी ने कहा कि, 'हां, कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है' दरअसल खबर यह थी कि राहुल गांधी ने मुसलमान बुद्धिजीवियों से मुलाकात के दौरान कहा था कि हम पर तुष्टिकरण का आरोप लगता है तो लगे लेकिन अब मुसलमान भी इस देश में दूसरे दलित हो गए हैं इसलिए कांग्रेस मुसलमानों का साथ देगी और अगर कोई  कहता  है कि उनकी पार्टी मुसलमानों की पार्टी है तो जवाब  है कि  हां कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है।

प्रधानमंत्री ने इस खबर से यह अर्थ निकाल लिया कि कांग्रेस केवल मुसलमानों की पार्टी है। उनके प्रवक्ता और टीवी चैनल एक दिन पहले से ही इसी बात को प्रमुखता से चला रहे थे। प्रधानमंत्री के बारे में कहा जाता है कि वे शिकस्त के मुंह से खींच कर जीत निकाल लेते हैं। इसीलिए उन्होंने मुसलमान महिलाओं के रक्षक के रूप में अपने को पेश कर के हर मुसलमान के घर से कुछ वोट निकाल लेने की रणनीति बना ली है। लगता है कि इस बार के चुनाव में विकास को बैकबर्नर पर डालने की तैयारी शुरू हो चुकी  है। ऐसा इसलिए है कि अखिलेश यादव ने कह दिया  है कि  मोदी-योगी की सरकार समाजवादी सरकार द्वारा  किये गए कामों का उद्घाटन करके  वाहवाही लूटने की कोशिश कर रही  है, खुद का कोई विकास नहीं किया है।

प्रधानमंत्री ने 2014 का चुनाव नौजवानों के लिए नौकरी, महिलाओं की सुरक्षा, आर्थिक तरक्की, भ्रष्टाचार का खात्मा। लोकपाल की तैनाती जैसे मुद्दों के बारे में वायदा कर के लड़ा था। देश की जनता  ने उनका विश्वास किया और उनको वोट दिया।  हालांकि उस चुनाव में भी मुजफ्फरनगर के दंगे का जाक्र उनकी पार्टी के ज़्यादातर नेताओं ने किया था।  मुजफ्फरनगर के  दंगे के बहुत सारे अभियुक्त बीजेपी के चुनाव प्रचार की अगली कतार में थे लेकिन चुनाव  में जीत नरेंद्र मोदी के आर्थिक विकास के नारे, किसानों की खुशहाली, महिलाओं की सुरक्षा, पाकिस्तान को दुरुस्त करने और नौजवानों की नौकरियों के वायदे की वजह से मिली थी। लेकिन पिछले चार साल में ऐसा कुछ नहीं हुआ है जिसके बाद कोई भी कह सके कि  नौजवानों को नौकरियां मिली हैं। इसके उलटे सरकार और बीजेपी की तरफ से नौकारियों की परिभाषा ही बदलने की बात कर दी गई। दावा किया गया कि मुद्रा लोन जैसी स्कीमों से बहुत नौकरियां मिल गईं हैं।  लेकिन जिसको नौकरी चाहिए वह इन बातों में नहीं आता। जब नोटबंदी की गई थी तो दावा किया गया था उसके बाद भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म हो जाएगा। लेकिन वह भी कहीं नजर नहीं आ रहा है।

आतंकवाद भी है बल्कि  हालात और बिगड़े हैं और भ्रष्टाचार भी है। जब बीजेपी के प्रवक्ता और मंत्री टीवी पर दावा करते हैं  कि देश में भ्रष्टाचार खत्म हो गया है तो पूरे देश में खबर देख रहा व्यक्ति केवल मुस्करा देता है क्योंकि भ्रष्टाचार कहीं कम नहीं हुआ है। नोटबंदी के बाद मौजूदा सरकार का एक बड़ा ऐतिहासिक $कदम था जीएसटी उसके बाद महंगाई खत्म करने का दावा किया गया था लेकिन वह भी नहीं हुआ। महंगाई तो रोज ही बढ़ रही है। जीएसटी से अगर कोई फायदा हो रहा  है तो बीजेपी नेता अब उसका जाक्र नहीं करते। जाहिर है उनको मालूम है कि 2014 के वायदों का जाक्र करना उतना उपयोगी नहीं है। इसलिए इस बार के संकेतों से लगता है कि 2019  का चुनाव  साम्प्रदायिक धु्रवीकरण के मुद्दे पर लाने की तैयारी हो रही है।

2014 के चुनाव में बीजेपी-विरोधी पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़कर बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों की जीत को आसान बना दिया था। लेकिन इस बार लगता है कि ऐसा नहीं होने जा रहा है। अपने-अपने प्रभाव के इलाकों में क्षेत्रीय पार्टियां एकजुट होंगी और अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी के लिए मुश्किल हो जायेगी। शायद इसीलिए पार्टी ने  धार्मिक मुद्दों को चुनाव का विषय बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। यह तय है कि बीजेपी को इस बार 2014  की तुलना में भारी चुनौती मिलेगी। इस बार वायदों पर नहीं, काम पर वोट मिलेगा। अगर देश चौकन्ना रहा और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं हो सका तो सत्ताधारी पार्टी सवालों के घेरे में पूरी तरह से घिरी रहेगी। बीजेपी ने भी कांग्रेस के ऊपर हिन्दू-मुस्लिम विभाजन का आरोप लगाकर चुनावी माहौल को गरमाने की कोशिश शुरू कर दिया है।

बीजेपी के राष्ट्रीय मुख्यालय में प्रेस वार्ता में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने आरोप लगाया कि कांग्रेस खतरनाक सांप्रदायिक कार्ड खेल रही है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि आज से 2019 के बीच कुछ भी अप्रिय घटित होता है तो कांग्रेस पूरी तरह जिम्मेदार होगी। उन्होंने सवाल पूछा कि 'क्या कांग्रेस एक मुस्लिम पार्टी है? उन्हें इस पर सफाई देनी चाहिए। राहुल गांधी को इस मुद्दे पर सामने आना चाहिए और बताना चाहिए कि मुस्लिम पार्टी से उनका क्या मतलब था।' इसका  मतलब यह है कि अगर कुछ भी अप्रिय हुआ तो उसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने की पेशबंदी शुरू हो गई है। इसके अलावा सरकार का पक्ष लेने वाले मीडिया संस्थान भी राग हिन्दू-मुस्लिम की जुगलबंदी पर आ गए हैं। जाहिर है देश की जनता को ही स्थिति को संभालना है क्योंकि साम्प्रदायिकता का जहर एकता का दुश्मन होता है।
 

Source:Agency