भाजपा को एक सांप्रदायिकता का ही सहारा!

By Jagatvisio :24-07-2018 06:38


 इस साल के आखिर में होने वाले राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के विधानसभाई चुनावों से होते हुए, 2019 के आम चुनाव तक, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का यह अभियान तेज से तेज होने जा रहा है। आर्थिक मोर्चे पर, सबसे बढ़कर रोजगार से लेकर आम जनता की जिंदगी को प्रभावित करने वाले हरेक पहलू तक, मोदी सरकार की घोर विफलता से जनता का बढ़ते पैमाने पर मोहभंग हो रहा है। इस मोहभंग को मुखर होने से रोकने के लिए भाजपा समेत संघ परिवार, इजारेदार मीडिया पर दबाव का इस्तेमाल करने से लेकर, असहमति तथा विरोध की आवाजों पर तरह-तरह के मुकदमे थोपने से लेकर, तरह-तरह से आतंकित करने तक के जो भी हथियार आजमाता आया है, उनकी धार ज्यादा से ज्यादा भोथरी होती जा रही है। इसका पता, 2018 में हुए लोकसभा तथा विधानसभा के उपचुनावों के  नतीजों से बखूबी लग जाता है। 

नरेंद्र मोदी ने संसद के मानसून सत्र से पहले ही आने वाले आम चुनाव के लिए बाकायदा प्रचार अभियान की ही शुरूआत नहीं की है, उन्होंने खासतौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश के हाल के अपने दौरों के भाषणों से यह भी स्पष्टï कर दिया है कि 2019 के चुनाव के अपने अभियान में भाजपा, 2014 के चुनाव के मुकाबले कहीं खुलकर सांप्रदायिक दुहाई का सहारा लेने जा रही है। बेशक, इसका मतलब यह नहीं है कि इस बार के मोदी के चुनाव के प्रचार में विकास के वादों से पूरी तरह से मुंह ही मोड़ लिया जाएगा। लेकिन, इतना जरूर है कि इस बार मोदी के नेतृत्व में भाजपा के चुनाव प्रचार का सांप्रदायिक रंग, पिछली बार के मुकाबले कहीं ज्यादा चटख होगा। और इसका मुख्य रूप सिर्फ भाजपा को 'हिंदुओं का हितैषी' और उसके विरोधियों को दूसरों, खासतौर पर मुसलमानों का हितैषी दिखाने का ही नहीं होगा। इस बार वे 'अल्पसंख्यक तुष्टïीकरण' के अपने पुराने आरोप से गुणात्मक रूप से आगे जाएंगे। सत्ता पक्ष और विपक्ष को इस तरह संप्रदायों के साथ नत्थी करने से आगे बढ़कर, अब इस राजनीतिक विरोध को इन संप्रदायों के कल्पित विरोध तथा टकराव की ही अभिव्यक्ति बनाकर पेश किया जा रहा होगा। याद रहे कि सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों पर 'अल्पसंख्यक तुष्टïीकरण' के आरोप में, अल्पसंख्यकों को दूसरा या पराया करने से आगे उन्हें 'विरोधी' कर देेने का तत्व तो हमेेशा से ही निहित था। अब उस विरोध को और बढ़ाकर, बाकायदा 'शत्रुता' के मुकाम पर पहुंंचा दिया गया है। 

पूर्वी-उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ के अपने संबोधन में नरेंद्र मोदी ने जिस तरह प्रत्यक्षत: कांग्रेस को और आम तौर पर तमाम विपक्ष को 'मुसलमानों की पार्टी' बनाकर पेश किया है, उसका ठीक यही अर्थ है। बेशक, इस भाषण में प्रधानमंत्री बड़ी चतुराई से 'तीन तलाक' संबंधी कानून के प्रसंग में, कांग्रेस/ विपक्ष को सिर्फ मुसलमान मर्दों की पार्टी होने का ताना भी देते हैं। लेकिन, यह किसी से छुपा नहीं रह सकता है कि प्रधानमंत्री का फोकस मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर नहीं, बल्कि विरोधियों पर मुसलमान का लेेबल चस्पां करने पर ही था।

इसीलिए तो उन्होंने अपने इस दावे के एक और सबूत के तौर पर यह याद दिलाना भी जरूरी समझा था कि इससे पहले प्रधानमंत्री की हैसियत से मनमोहन सिंह ने भी, देश के संसाधनों पर मुसलानों का 'पहला दावा' होने की बात कही थी। वास्तव में इस प्रसंग में मनमोहन सिंह के पुराने बयान का उद्धृत किया जाना, न सिर्फ यह दिखाता है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा अब तुष्टïीकरण-विरोध की लफ्फाजी को और आगे बढ़ाते हुए, अपने विरोधियों को 'शत्रु समुदाय' का हिस्सा ही बताने जा रही है बल्कि यह भी दिखाता है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कांग्रेस के मुसलमानों की पार्टी होने का तथाकथित बयान तो सिर्फ बहाना था। विरोधियों को हिंदू-विरोधी साबित करने के लिए, मुसलमान पार्टी करार देना तो, आने वाले चुनाव के लिए सांप्रदायिक ताप बढ़ाने की संघ-भाजपा की सुचिंतित कार्यनीति का ही हिस्सा है। वास्तव में इसकी शुरूआत तो गुजरात के पिछले विधानसभाई चुनाव के समय ही हो गई थी। बाद में इसी दांव को कर्नाटक के विधानसभाई चुनाव में भी आजमाया गया था। लेकिन, वहां तक खुद प्रधानमंत्री ने अपने मुंह से विरोधियों को मुसलमान यानी 'हिंदू-शत्रु' पार्टी नहीं कहा था। अब, वह पर्दा भी हट गया।

जैसे इतना ही काफी न हो, नरेंद्र मोदी के विरोधियों को हिंदू-विरोधी साबित करने के पूरक के रूप में, अमित शाह ने अगले चुनाव से पहले अयोध्या में राम मंदिर बनना शुरू हो जाने का आश्वासन दे दिया। बेशक, हैदराबाद में भाजपा नेताओं की बंद दरवाजे के पीछे हुई बैठक में दिए अपने अध्यक्ष के इस आश्वासन से बाद में भाजपा को साफ इंकार ही करना पड़ गया। उनके इस आश्वासन ने अनेक ऐसे सवाल उठ खड़े हुए, जिनका जवाब देना मोदी सरकार के लिए मुश्किल होता। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब अयोध्या में विवादित भूमि के स्वामित्व का विवाद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, तब भाजपा अध्यक्ष के ऐसा आश्वासन देने का क्या अर्थ है? क्या उनकी सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का पहले से पता है! जाहिर है कि खुद भाजपा के प्रवक्ता द्वारा मीडिया को इसकी जानकारी दिए जाने के बाद, भाजपा के शाह के बयान से इंकार करने को शायद ही कोई गंभीरता से लेगा। याद रहे कि यह बयान हैदराबाद में दिया गया था, जिससे ऐतिहासिक रूप से जुड़े आंध्रप्रदेश तथा तेलंगाना, दोनों में ही भाजपा न सिर्फ कमजोर है बल्कि सहयोगी-विहीन भी है। इससे यह और भी साफ हो जाता है कि आने वाले चुनाव में समर्थन जुटाने के लिए भाजपा, अपने सांप्रदायिक चेहरे पर ही ज्यादा भरोसा करने जा रही है।

इस तरह, इस साल के आखिर में होने वाले राजस्थान, मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के विधानसभाई चुनावों से होते हुए, 2019 के आम चुनाव तक, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का यह अभियान तेज से तेज होने जा रहा है। आर्थिक मोर्चे पर, सबसे बढ़कर रोजगार से लेकर आम जनता की जिंदगी को प्रभावित करने वाले हरेक पहलू तक, मोदी सरकार की घोर विफलता से जनता का बढ़ते पैमाने पर मोहभंग हो रहा है। इस मोहभंग को मुखर होने से रोकने के लिए भाजपा समेत संघ परिवार, इजारेदार मीडिया पर दबाव का इस्तेमाल करने से लेकर, असहमति तथा विरोध की आवाजों पर तरह-तरह के मुकदमे थोपने से लेकर, तरह-तरह से आतंकित करने तक के जो भी हथियार आजमाता आया है, उनकी धार ज्यादा से ज्यादा भोथरी होती जा रही है। इसका पता, 2018 में हुए लोकसभा तथा विधानसभा के उपचुनावों के  नतीजों से बखूबी लग जाता है। 

इसी सच्चाई की पुष्टिï करते हुए, मोदी सरकार की चौथी सालगिरह की पूर्व-संध्या में आए सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे में यह बताया गया था कि न सिर्फ विधानसभाई चुनाव के अगले चक्र में राजस्थान तथा मध्यप्रदेश में भाजपा का हारना तय है बल्कि अगर तुरंत चुनाव हो जाएं तो देश के पैमाने पर भी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को सिर्फ 37 फीसद मतदाताओं का समर्थन मिलने जा रहा है, जबकि उसके लिए मुख्य चुनौती बनने वाले कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूपीए को ही 31 फीसद मतदाताओं का समर्थन। याद रहे कि इन दोनों गठबंधनों से बाहर की अन्य पार्टियां इस गिनती से बाहर हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि ठीक एक साल पहले, एनडीए के लिए यह समर्थन 45 फीसद था, जो इसी साल जनवरी तक घटकर भी कम से कम 40 फीसद तो था ही। अब उससे भी नीचे खिसक गया है। दूसरी ओर यूपीए के लिए समर्थन एक साल पहले 27 फीसद ही था, जो इसी साल जनवरी तक बढ़कर 30 फीसद पर पहुंच गया था और अब वहां से भी कुछ और ऊपर चढ़ गया है। इस तरह, मोदी के नेतृत्व में एनडीए के समर्थन में यह गिरावट न सिर्फ जारी है बल्कि समय के साथ उसकी रफ्तार भी बढ़ रही है।

इस निश्चित तथा तीखी गिरावट को रोकने के लिए संघ-भजपा का हाथ-पैर मारना स्वाभाविक है। रमजान के महीने के फौरन बाद और अमरनाथ यात्रा से ठीक पहले भाजपा का जम्मू-कश्मीर की अपनी ही गठजोड़ सरकार को गिराना भी, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक आधार को पुख्ता करने की कोशिश का ही हिस्सा है। इस तरह अगर यह साफ है कि विपक्ष की एकता की तमाम सीमाओं के बावजूद, भाजपा को आने वाले दिनों में उत्तरोत्तर ज्यादा कड़े प्रतिपक्ष का सामना करना पड़ेगा, तो यह भी स्पष्टï है कि मोदी राज की तमाम नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए वह, ज्यादा से ज्यादा खुलकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की शरण ले रही होगी। बेशक, गुजरात का ही उदाहरण बताता है कि भाजपा को इस रास्ते से चुनावी कामयाबी मिलना भी मुश्किल है क्योंकि भारतीय जनता का बड़ा हिस्सा, ऐसी प्रकटत: सांप्रदायिक पार्टी को अपना विश्वास नहीं सौंपना चाहेगा। फिर भी अपने इस पैंतरे से भाजपा समेत संघ परिवार, देश में सांप्रदायिक खाई को तो पहले से चौड़ा कर ही देंगे।
 

Source:Agency