सवाल तो और भी हैं मोदीजी

By Jagatvisio :13-08-2018 08:43


राजनीतिज्ञ को भविष्यदृष्टा होना चाहिए, ना कि भविष्यवक्ता। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो 2019 के चुनावों में न केवल अपनी रिकार्ड जीत की भविष्यवाणी की है, बल्कि महागठबंधन की विफलता का दावा भी ठोंक दिया है। इस साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की साख दांव पर लगी है। बीते कुछ उपचुनावों में भाजपा को हार मिली, उसके पुराने साथी भी कुछ नाराज दिखाई दिए तो विधानसभा चुनावों में हार की आशंका बलवती होने लगी। पिछले चार सालों का हिसाब-किताब भी अब जनता मांगने लगी है। इसलिए जरूरी है कि भाजपा अब रक्षात्मक होकर खेले, लेकिन अंदाज आक्रामक ही रहे। इसलिए नरेन्द्र मोदी अपनी जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं, लेकिन साथ-साथ विपक्ष को भी कोस रहे हैं। हाल ही में उन्होंने एक साक्षात्कार दिया और उसमें एनआरसी, रफाएल सौदा, बेरोजगारी, भीड़ की हिंसा से लेकर राहुल गांधी के गले मिलने तक तमाम सवालों के जवाब दिए।

हालांकि इस साक्षात्कार को पढ़कर ऐसा लगता है कि इसमें सवाल-जवाब नही ंथे, बल्कि यह स्वगत भाषण यानी मोनोलॉग  था। बेशक साक्षात्कार में कुछ सवाल पहले से तय होते हैं, लेकिन जवाब जब दिए जाते हैं, तो उसमें से भी सवाल निकलते हैं। लेकिन यहां ऐसा कुछ नही ंलगा। बस एक के बाद एक उन मुद्दों को उठाया गया, जिनके बारे में इन दिनों देश में चर्चा है या विपक्ष जिन्हें उठाता रहता है और उन पर प्रधानमंत्री के तयशुदा जवाब सामने आ गए। मोदीजी ने इससे पहले भी जो गिने-चुने साक्षात्कार, गिने-चुने पत्रकारों को दिए हैं, उनमें भी ऐसा ही हुआ है। आप बस चुनिंदा सवाल करिए और मोदीजी के जवाब सुन लीजिए। पलटकर या बीच में टोक कर सवाल करना पत्रकारिता के लिहाज से अच्छा माना जाता होगा, नैतिकता के हिसाब से नहीं। और यह वक्त मीडिया में नैतिकता दिखाने का ही है।

बहरहाल, भीड़ की हिंसा के बढ़ते प्रकरणों के बीच जब मोदीजी से इस पर पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मॉब लिंचिंग अपराध है, उसका मकसद चाहे जो भी हो। कोई भी व्यक्ति कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता। यहां यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या मोदीजी की राय ही भाजपा की राय है, क्योंकि उसके कई नेता धर्मविशेष के लोगों के खिलाफ भीड़ की हिंसा को जायज ठहराने वाले बयान दे चुके हैं। ऐसे लोगों को पार्टी निकालती क्यों नहीं है? हर साल दो करोड़ रोजगार देने का भाजपा का वादा झूठा साबित हो चुका है। इससे पहले दिए साक्षात्कार में मोदीजी ने पकोड़ा तलने को भी रोजगार बताया था। अब उनका कहना है कि रोजगार को लेकर विपक्ष का प्रचार अब बंद होना चाहिए। उनके मुताबिक, खाना, लॉजिस्टिक्स, ई-कॉमर्स, मोबाइल सोल्यूशन और इस तरह के कई सेक्टरों में ऐप आधारित एग्रीगेटर्स की भरमार है, क्या यह नये रोजगार का सृजन नहीं कर रहे हैं? मान लिया कि इनसे नए रोजगार बन रहे हैं, पर सरकार की भूमिका इसमें किस हद तक है, सवाल तो यह भी है। क्या हर साल डिग्रीधारी नौजवानों को रोजगार देने का काम सरकार कर रही है? या वे खुद ही अपने उद्यम से अपनी आजीविका चला रहे हैं? अगर सब कुछ खुद ही करना है, तो सरकार अपनी जिम्मेदारी कब और कैसे निभाएगी? 

रफाएल सौदे पर मोदीजी का कहना है कि कांग्रेस बोफोर्स के भूत से अपना पीछा छुड़ाने के लिए हमेशा से झूठ का सहारा लेती रही है। रफाएल डील पर विवाद भी इसी प्रॉपेगैंडा का हिस्सा है। पर मोदीजी यह क्यों नहीं देखते कि केवल कांग्रेस नहीं बल्कि अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा ने भी रफाएल सौदे में भ्रष्टाचार की बात कही है, क्या उन्हें भी बोफोर्स के भूत ने जकड़ा है? अमित शाह ने तो इस पर तंज ही कस दिया कि -रक्षामंत्री के बयान पर भरोसा किया जाएगा या उन पर जिन्हें काम (मंत्री पद) नहीं मिला। एक संवेदनशील मुद्दे पर जिम्मेदारी के साथ जवाब देने की जगह तंज कसना क्या उचित है, यह सवाल भी मोदीजी से किया जाना चाहिए था। राहुल गांधी के गले मिलने को मोदीजी ने फिर नामदार-कामदार के शब्दों में उलझाते हुए, इसे उनकी बचकानी हरकत बताया। लेकिन जिस नफरत और घृणा के विरोध में राहुल गांधी ने यह किया था, उस पर मोदीजी का क्या कहना है, यह अभी देश को पता नहीं है।

आरक्षण पर मोदीजी ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि यह खत्म नहीं होगा। उन्होंने कहा हमारे संविधान का उद्देश्य और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर का सपना अभी तक पूरा नहीं हुआ है और इसे पूरा करना हम सभी की जिम्मेदारी है। आरक्षण की इसमें अहम भूमिका है और ये कभी खत्म नहीं होने जा रहा है। और जब उन्होंने संविधान और बाबा साहब की बात कही तो संविधान की प्रतियां जलाने वालों या अंंबेडकर को अपशब्द कहने वालों पर भी उनकी राय जाननी चाहिए थी। महागठबंधन को मोदीजी ने मौकापरस्ती करार दिया और कहा कि यह सैद्धांतिक समर्थन के लिए नहीं बल्कि निजी बचाव के लिए हो रहा है। सवाल ये है कि वे कब बिखरेंगे, चुनाव से पहले या बाद में। वैसे सवाल तो यह भी है मोदीजी कि भाजपा जिन दलों के साथ जुड़ी या जो दल भाजपा के साथ जुड़े, क्या वे सत्ता की लालसा के लिए नहीं था, या उसका भी कोई फकीराना मकसद था।

Source:Agency