भागवत जी, आपका 'आर्गनाइजर' तो तिरंगे को अशुभ ही बता रहा था!

By Jagatvisio :25-09-2018 07:11


साफ कहें तो सोलह साल पहले तिरंगे के प्रति उमड़ा संघ परिवार का प्रेम उसके अपनी धुरी पर पूरे 360 अंश घूम जाने जैसा है, इसलिए आम लोग उसे आज भी गहरे संदेह के साथ देखते हैं। सरोकारों के लिहाज से भी लोगों को यह राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाषचन्द्र बोस व भगत सिंह आदि को उनकी पहचानें बदलकर 'अपनानेÓ के अभियानों से अलग नजर नहीं आता। क्योंकि इससे पहले का तिरंगे से जुड़ा संघपरिवार का सारा इतिहास या तो सम्पूर्णता में उसके नकार का रहा है या साम्प्रदायिक विद्वेष के लिए उसके 'सबसे अलग' इस्तेमाल का।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गत 17 से 19 सितम्बर तक देश की राजधानी में सम्पन्न अपने बहुप्रचारित संवाद कार्यक्रम में और तो जो 'चमत्कार' किये, सो किये ही, तिरंगे झंडे के प्रति संघ के पुराने और प्रतिगामी रवैये का इतिहास 'बदलनेÓ के क्रम में सर्वथा गलतबयानी पर उतर आये।

संवाद कार्यक्रम के पहले ही दिन तिरंगे के प्रति दृष्टिकोण का सवाल उठने पर उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस की कार्यसमिति ने 19 दिसम्बर, 1929 को पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित कर 26 जनवरी, 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने व तिरंगे फहराने का आह्वान किया तो संघ के संस्थापक डॉ. केशवबलिराम हेडगेवार ने बाकायदा परिपत्र जारी कर उसकी सारी शाखाओं से स्वयंसेवकों की सभाएं आयोजित कर उनमें तिरंगे का वन्दन करने को कहा था।

भागवत के दुर्भाग्य से सच्चाई यह है कि इस सिलसिले में डॉ. हेडगेवार ने 21 जनवरी, 1930 को जो परिपत्र जारी किया, उसमें संघ की सभी शाखाओं से 26 जनवरी, 1930 को सायंकाल ठीक छ: बजे अपने-अपने संघ स्थान पर अपनी-अपनी शाखाओं के सभी स्वयंसेवकों की सभा लेकर भगवा ध्वज को ही वन्दन करने को कहा गया है न कि तिरंगे को। क्योंकि उनके निकट भगवा ध्वज ही 'राष्ट्रीय' था।

इस सच को दूसरे पहलू से देखें तो 2002 से पहले तक संघ की शाखाओं तो कौन कहे, उसके नागपुर स्थित मुख्यालय तक पर तिरंगा नहीं फहराया जाता था। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस तक पर भी नहीं। उसकी राजनीतिक फ्रंट भारतीय जनता पार्टी की बहुप्रचारित तिरंगा यात्राओं ने भी, जिनकी बाबत दावा किया जाता है कि उन्होंने 'देशभक्ति' का 'न भूतो न भविष्यति' जैसा 'ज्वार' उत्पन्न किया और तिरंगे को जम्मू कश्मीर के कठुआ में गैंगरेप व हत्या के आरोपियों के समर्थन में फहराने के अंजाम तक ले गईं, नरेन्द्र मोदी सरकार के दौरान ही जोर पकड़ा।

साफ कहें तो सोलह साल पहले तिरंगे के प्रति उमड़ा संघ परिवार का प्रेम उसके अपनी धुरी पर पूरे 360 अंश घूम जाने जैसा है, इसलिए आम लोग उसे आज भी गहरे संदेह के साथ देखते हैं। सरोकारों के लिहाज से भी लोगों को यह राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाषचन्द्र बोस व भगत सिंह आदि को उनकी पहचानें बदलकर 'अपनाने' के अभियानों से अलग नजर नहीं आता। क्योंकि इससे पहले का तिरंगे से जुड़ा संघपरिवार का सारा इतिहास या तो सम्पूर्णता में उसके नकार का रहा है या साम्प्रदायिक विद्वेष के लिए उसके 'सबसे अलग' इस्तेमाल का।

जानकारों की मानें तो संविधान सभा में एच.बी.कामथ, सेठ गोविन्ददास, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, तजम्मुल हुसैन, डा. एच.सी. मुखर्जी, आर. क.े सिधवा, जयपाल सिंह, ज्ञानी गुरुमुख सिंह, मुसाफिर, जयनारायण व्यास, सरोजनी नायडू, फै्रन्क रेजीनाल्ड, एन्थानी, मनिस्वामी पिल्ले वगैरह ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रस्ताव का गर्मजोशी से समर्थन करके तिरंगे झंडे को एक स्वर से राष्ट्रीय झंडे के रूप में स्वीकार किया और पूरे देश की आत्मा में रचा बसा दिया था, तो संघ को यह कतई हजम नहीं हुआ था। तब उसके नेताओं ने तिरंगे को कभी आधे-अधूरे मन से भी स्वीकार नहीं किया था क्योंकि उन्हें उसके बजाय भगवा झंडा चाहिए था और वे उसी के प्रति अनुराग जताते घूम रहे थे।

14 जुलाई, 1946 को संघप्रमुख गुरू गोलवलकर ने साफ कहा था कि- भगवा झंडा ही हमारी महान संस्कृति को सम्पूर्णता में व्यक्त करता है। यह ईश्वर का रूप है और हमें विश्वास है कि अंत में पूरा राष्ट्र इस भगवा ध्वज के आगे सिर नवायेगा। यही नहीं, जुलाई 1947 में बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के बम्बई प्रवास के दौरान हिन्दू महासभा के अनेक कार्यकर्ताओं ने उनसे भेंट की और सुझाया कि राष्ट्रीय झंडा भगवा झंडा ही हो। 10 जुलाई, 1947 को डॉ. अम्बेडकर वापस दिल्ली जाने लगे तो हिन्दुत्ववादियों द्वारा उन्हें शांताक्रूज हवाई अड्डे पर भगवा झंडा अर्पित कर कहा गया कि भगवा के लिए आंदोलन करना पड़ा तो वे वह भी करेेंगे।

उस दौर में संघ का मुखपत्र 'आर्गनाइजर' इस बात को लेकर लगातार व्यथित था कि संविधान सभा तिरंगे को राष्ट्रीय झंडा बनाना चाहती है। सात जुलाई, 1947 के अंक में 'नेशनल फ्लैग' शीर्षक से उसमें जो सम्पादकीय प्रकाशित हुआ, उसमें मांग की गयी कि तिरंगे की जगह भगवा होना चाहिए। उसमें कहा गया कि 'भारत के सभी सम्प्रदायों एवं दलों को स्वीकार्य झंडे का तर्क देना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है। वही झंडा राष्ट्रीय झंडा हो सकता है, जो अकेले हिन्दूू राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता हो। हम सभी सम्प्रदायों की इच्छाओं, आकांक्षाओं को पूरा करने की दृष्टि से झंडे का चयन नहीं कर सकते।'

इसके बाद भगवा झंडे की महिमा का बखान करते हुए कहा गया कि 'इसे सिर्फ वही नहीं अपना सकते जो मूर्ख या दुष्ट हैं। सिर्फ यही झंडा (भगवा झंडा) हिन्दुस्तान का सच्चा राष्ट्रीय झंडा हो सकता है। राष्ट्र को वही सिर्फ यही मान्य होगा।'

इतना ही नहीं, 'आर्गनाइजर' में स्वाधीनता के पूर्व लिखे गये सभी सम्पादकीयों में तिरंगे की जगह भगवा झंडे को राष्ट्रीय झंडा बनाने की मांग की जाती रही। उसके 14 अगस्त, 1947 के अंक में 'मिस्ट्री बिहाइंड द भगवा ध्वज' शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें दिल्ली के लालकिले पर भगवा झंडा फहराने की मांग की गयी तथा इन शब्दों में तिरंगे को राष्ट्रीय झंडा बनाने की खुलकर निंदा की गयी। 'वे लोग जो भाग्य के बल पर सत्ता में आ गये हैं, हमारे हाथों में भले ही तिरंगा पकड़ा दें, पर यह कभी हिन्दुओं का आदर नहीं पा सकेगा और न उनके द्वारा अपनाया जा सकेगा। तीन की संख्या अपने आप में अशुभ है और तीन रंगों वाला झंडा निश्चित रूप से मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव डालेगा और यह देश के लिए हानिकारक होगा।'

आजादी के बाद भी संघ परिवार में तिरंगे की आलोचना करना नहीं छोड़ा। विश्व हिन्दू परिषद के निर्देशन में काम करने वाली संत समिति ने 13 एव 14 अगस्त, 1982 की बैठक में भारतीय संविधान को हिन्दूविरोधी घोषित करते हुए स्वामी मुक्तानंद सरस्वती की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति के द्वारा तैयार दस्तावेज में राष्ट्रगान की भर्त्सना करते हुए घोषित किया गया कि राष्ट्रीय झंडे में जो अशोक चक्र है, उससे साम्राज्यवाद की गंध आती है। संघ परिवार को अशोक चक्र से इसलिए नफरत है क्योंकि यह चक्र बौद्ध धर्म में प्रेम, समता व भाईचारे का प्रतीक है, जिससे हिन्दुत्ववादियों को चिढ़ है।

कभी तिरंगे को अशुभ व उसे फहराने वालों को मूर्ख कहने वालों के वारिस आज हाथों में तिरंगा झंडे लेकर देशभक्ति का पाखंड कर रहे हैं, तो इसे उनकी मजबूरी और अपने लोकतंत्र की विजय मानते हुए भी याद रखना चाहिए कि संघ से जुड़े नेता तिरंगे झंडे को साम्प्रदायिक विद्वेष भड़काने के लिए भी इस्तेमाल करते रहे हैं। मुरलीमनोहर जोशी श्रीनगर के लालचैक पर तथा उमाभारती एक ईदगाह पर तिरंगा झंडा लेकर साम्प्रदायिक विद्वेष पैदा करने के लिए ही गयी थीं। 
 

Source:Agency